जसीडीह : डाबरग्राम स्थित इस्कॉन मंदिर में तीन दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का शनिवार को समापन हो गया. अंतिम दिन नंदोत्सव के साथ इस्कॉन के संस्थापक आचार्य श्रील प्रभुपाद की 130वीं जयंती मनायी गयी. नंदोत्सव और श्रील प्रभुपाद के जन्मदिन पर केक काटे गये.
मंगल आरती के बाद गुरु पूजा और भागवत कथा
सुबह मंगल आरती के बाद गुरु पूजा और भागवत कथा का आयोजन किया गया. इसमें इस्कॉन प्रमुख श्रीनिवास गोपाल दास ने नंदोत्सव के महत्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि नंदोत्सव जन्माष्टमी के अगले दिन भाद्र मास की नवमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन वृंदावन के लोग नंद और यशोदा के यहां पुत्र जन्म की खुशी में बधाई देने पहुंचते हैं.
नृत्य-संगीत और नाटक से भक्तिमय हुआ माहौल
इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया. इसमें अनुयायियों और बच्चों ने नृत्य, संगीत और विभिन्न नाटकों की प्रस्तुति दी. कार्यक्रम में श्रील प्रभुपाद की महिमा का कीर्तन, पुष्प अभिषेक, भोग निवेदन और महाआरती की गयी.
108 भोग के बाद भक्तों में बांटा गया महाप्रसाद
कार्यक्रम में 108 भोग निवेदन के बाद महाप्रसाद का वितरण किया गया. प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों की भीड़ लगी रही. रात में नाटक की प्रस्तुति हुई और केक काटकर संस्थापक आचार्य श्रील प्रभुपाद का जन्मदिन मनाया गया. हरे कृष्ण महामंत्र और हरि बोल के उद्घोष से पूरा परिसर भक्तिमय हो गया.
श्रील प्रभुपाद के योगदान को किया याद
कार्यक्रम में बताया गया कि अभयचरणविंद भक्ति वेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद भगवान कृष्ण के भक्त और वैष्णव गुरु थे. उन्होंने पूरे विश्व में सनातन धर्म के प्रचार के लिए इस्कॉन की स्थापना की. उन्हें इस्कॉन का संस्थापक एवं आचार्य बताया गया.
बताया गया कि श्रील प्रभुपाद ने 1965 में अमेरिका के बोस्टन में इस्कॉन का पहला मंदिर बनाया था. उनका जन्म 1889 में कोलकाता के टॉलीगंज में हुआ था. उन्होंने 12 वर्षों में पूरे विश्व में 12 बार भ्रमण किया और विश्व में 108 इस्कॉन के बड़े मंदिर स्थापित किये. 70 वर्ष की उम्र में अमेरिका जाकर उन्होंने भारतीय संस्कृति का प्रचार किया. स्थापित किये हैं. वे 70 वर्ष की उम्र में अमेरिका में जाकर भारतीय संस्कृति का प्रचार किये थे.
