सिक्किम टनल हादसे ने छीना परिवार का सहारा, ‘अगर मैं नहीं जाऊंगा तो पेट कैसे भरेगा’..यही आखिरी बात रह गई याद

सिक्किम टनल हादसे में पश्चिमी सिंहभूम के मसीह बरजो की मौत से परिवार बेसहारा हो गया है. पत्नी मंगरी का रो-रोकर बुरा हाल है, घर में अब खाने का भी संकट है.

पश्चिमी सिंहभूम जिले के बंदगांव प्रखंड अंतर्गत जलासार पंचायत के मदुरा गांव निवासी मसीह बरजो अब कभी अपने घर नहीं लौट पाएंगे. रोजी-रोटी की तलाश में हजारों किलोमीटर दूर सिक्किम गए मसीह की नामची जिले में सुरंग निर्माण कार्य के दौरान हुए हादसे में मौत हो गई. अब उनका पार्थिव शरीर ताबूत में गांव पहुंचेगा, जहां परिवार अंतिम दर्शन का इंतजार कर रहा है.

पत्नी और बेटे ने जाने से किया था मना

सिक्किम जाने से पहले पत्नी मंगरी बरजो और बेटे दयाल बरजो ने मसीह को बाहर कमाने जाने से रोकने की कोशिश की थी. परिवार की आर्थिक परेशानी को देखते हुए पत्नी चाहती थी कि वह गांव में रहकर ही कोई काम करें. लेकिन परिवार का पेट पालने और बच्चों के भविष्य की चिंता में मसीह बाहर काम करने चले गए.

घर से निकलते समय उन्होंने पत्नी से कहा था, "अगर मैं नहीं जाऊंगा, तो तुम लोगों का पेट कैसे भरेगा." आज यही बात परिवार को बार-बार याद आ रही है.

परिवार का एकमात्र सहारा चला गया

मसीह बरजो मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे. उनका सपना था कि मेहनत की कमाई से बच्चों की पढ़ाई जारी रखें और घर की हालत सुधारें. लेकिन सिक्किम में हुए हादसे ने उनकी जिंदगी छीन ली.

मसीह की मौत की खबर मिलते ही मदुरा गांव में शोक फैल गया. गांव के लोग इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि मेहनती और सरल स्वभाव के मसीह अब उनके बीच नहीं रहे.

तीन महीने पहले खरीदा था चावल, अब घर में अनाज नहीं

पत्नी मंगरी बरजो ने बताया कि घर में खेती नहीं है और न ही कोई दूसरा स्थायी रोजगार है. सिक्किम जाने से पहले मसीह ने उधार और बचत से एक बोरा चावल खरीदकर घर में रखा था. उन्हें उम्मीद थी कि मजदूरी मिलने के बाद वह पैसे घर भेज देंगे. लेकिन तीन महीने बीत गए. चावल खत्म हो गया और पैसे भी नहीं आए. अब परिवार का कमाने वाला भी नहीं रहा. रोते हुए मंगरी बरजो ने कहा, "अब घर में खाने के लिए अनाज नहीं है. पैसा भी नहीं है. मेरे बच्चों को कौन संभालेगा? मैं जिंदगी कैसे काटूंगी?"

शव को गांव लाना भी बनी बड़ी चुनौती

मसीह बरजो का घर जलासार पंचायत के मदुरा गांव में है. बरसात के कारण कारो नदी में पानी बढ़ गया है, जिससे गांव तक पहुंचने में परेशानी हो रही है.

जानकारी के अनुसार पार्थिव शरीर को रनिया से चेंगड़े, जलमंडी और गंजना होते हुए बंदगांव लाया जाएगा. इसके बाद मदुरा गांव तक करीब पांच किलोमीटर का रास्ता जंगल, पहाड़ी और कच्चे रास्ते से होकर गुजरता है. यहां चारपहिया वाहन नहीं पहुंच सकता. ऐसे में ग्रामीणों को शव को कंधे पर उठाकर गांव तक ले जाना पड़ेगा.

लकड़ी और तिरपाल की झोपड़ी में रह रहा परिवार

मंगरी बरजो का परिवार बहुत कठिन हालात में जीवन गुजार रहा है. लकड़ी के पटरे और मिट्टी से बनी छोटी झोपड़ी के ऊपर प्लास्टिक का तिरपाल लगा है, जिसमें परिवार रहता है.

बच्चों की पढ़ाई पर भी संकट

मसीह बरजो अपने पीछे पत्नी और पांच बच्चों को छोड़ गए हैं. बड़ा बेटा विजय बरजो (20 वर्ष) रांची में मजदूरी करता है. दयाल बरजो (25 वर्ष), अजय बरजो (13 वर्ष), रीता बरजो (11 वर्ष) और चंदना बरजो (6 वर्ष) गांव में रहते हैं. आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है. पिता की मौत के बाद बच्चों के भविष्य की चिंता और बढ़ गई है.

ग्रामीणों ने सरकार से मदद की मांग की

जलासार पंचायत के पूर्व उपमुखिया और समाजसेवी बासू बरजो ने परिवार की स्थिति पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि मसीह बरजो की मजदूरी से ही पूरे परिवार का खर्च चलता था. उन्होंने सरकार से परिवार को आर्थिक सहायता, बच्चों की पढ़ाई, राशन, आवास और अन्य जरूरी मदद देने की मांग की.

गांव में पसरा मातम

मसीह बरजो की मौत से मदुरा गांव में मातम पसरा हुआ है. गांव के लोगों ने बताया कि मसीह मेहनती और मिलनसार व्यक्ति थे. परिवार का भविष्य बेहतर बनाने के लिए वह घर से दूर गए थे, लेकिन अब उनका परिवार मुश्किल हालात में खड़ा है.


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By Anil tiwary

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