बोकारो, आनंद मार्ग प्रचारक संघ धर्म महासम्मेलन के दूसरे दिन शुक्रवार को आनंद नगर में व्यापक कार्यक्रम आयोजित हुए. शुरुआत प्रभात संगीत, बाबा नाम केवलम कीर्तन व सामूहिक ध्यान के साथ हुई. मार्ग गुरु प्रतिनिधि आचार्य विकासानंद ने श्रीश्री आनंदमूर्ति के दर्शन पर आधारित प्रवचन दिया. आचार्य विकासानंद ने कहा कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति संघर्ष व सामंजस्य से ही संभव है. जहां संघर्ष नहीं, वहां गति नहीं और जहां सामंजस्य नहीं, वहां स्थायित्व नहीं होती. ऐसी प्रगति में स्वयं आंदोलन ही एकमात्र लक्ष्य बन जाता है. जीवन ठहराव को स्वीकार नहीं करता, वह निरंतर रूपांतरण चाहता है. आचार्य ने कहा कि जब किसी की कला या क्षमता के विकास चरम बिंदु पर पहुंच जाती है, तो उसे ‘पराकाष्ठा’ कहा जाता है. उस अवस्था में आगे कोई परिवर्तन संभव नहीं रहता व गति एक सीधी रेखा में चलने लगती है. मनुष्य स्वभाव से लक्ष्य की ओर बढ़ने वाला प्राणी है. लक्ष्य के अभाव में किया गया श्रम व्यर्थ हो जाता है. मानव अस्तित्व की विविध अभिव्यक्तियां परिस्थिति व पर्यावरण से प्रभावित होती है. कुछ अभिव्यक्तियां जीवन, आजीविका, जन्म व मृत्यु से जुड़ी हैं. जबकि, कुछ नंदन विज्ञान या सौंदर्य विज्ञान से संबंधित है. आचार्य विकासानंद ने कहा कि अनुभूतियां मूलतः मानसिक होती हैं, फिर भी पर्यावरण इन्हें प्रभावित करता है. इसी कारण प्राचीन काल में तांत्रिक साधना अमावस्या की घनी अंधेरी रात में की जाती थी, ना कि पूर्णिमा की प्रकाशमय रातों में. अमावस्या का अंधकार तामसिक प्रवृत्तियों को उभारता है, जिनके विरुद्ध साधक को तीव्र संघर्ष करना पड़ता है. वहीं, पूर्णिमा की रात में व्यक्ति फूल, नदी की लहर, पत्तों के रंग व आकाश की ज्योति में रम जाता है. सांस्कृतिक शाखा रेनेसां आर्टिस्ट्स एंड राइटर्स एसोसिएशन के कलाकारों ने प्रभात संगीत पर आधारित कार्यक्रम की प्रस्तुति दी.
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