बोकारो: मशरूम हर किचन में जगह बना चुका है. शाकाहारी लोगों के लिए मशरूम स्वाद व पौष्टिकता की जरूरत पुरा करता है. बोकारो जिला में अनुमानत: प्रति दिन 01 हजार किलो मशरूम की खपत होती है. बोकारो में खपत का ज्यादात्तर हिस्सा रांची व अन्य जगहों से आयात किया जाता है.
2021 में बोकारो इस मशरूम उत्पादन मामले में लगभग आत्मनिर्भर बन गया था. झारखंड स्टेट लाइवलीहूड प्रोमोशल सोसाइटी (जेएसएलपीएस) व कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके)-पेटरवार के सहयोग से जिला में 1600 के करीब महिला-पुरूष मशरूम का उत्पादन कर रहे थे. लेकिन, 2026 आते-आते उत्पादन बंद हो गया. वर्तमान में केवीके से महज 60 लोग प्रशिक्षण प्राप्त कर उत्पादन कर रहे हैं. जेएसएलपीएस का सिस्टम इस मामले में हैंग कर गया है.
2021 में जेएसएलपीएस से जुड़ी 100 के करीब सखी मंडल से जुड़ी 550 से अधिक महिला विभिन्न मशरूम प्रजाति का उत्पादन कर रही थी. ज्यादातर सखी मंडल ऑयस्टर, पैडी व बटन मशरूम का उत्पादन कर रही थी. चंदनकियारी प्रखंड में जेएसएलपीएस की ओर से बकायदा सेटअप तैयार किया गया था. सबसे ज्यादा उत्पादन चंदनकियारी से ही हो रहा था. लेकिन, वर्तमान में सेटअप टूट गया है.
जेएसएलपीएस-बोकारो के डीपीएम अनिल कुमार की माने तो चंदनकियारी में स्ट्रक्चर खराब हो गया है, इसे फिर से बनाने के लिए प्रपोजल बनाया जा रहा है. पिछले साल तक एक दीदी निजी स्तर पर कर रही थी, लेकिन इस साल ऐसी कोई सूचना नहीं है. जानकार मानते हैं कि लोग बहुत उत्साह के साथ मशरूम की खेती से जुड़ते हैं, लेकिन यह उत्साह कुछ समय के लिए ही रहता है.
जिला में 08 तरह का देशी मशरूम
जानकारों की माने तो जिला की मिट्टी मशरूम के लिहाज से उर्वरा है. जिला के जंगल में 08 तरह का देशी मशरूम बरसात के दिनों में लोगों को देती है. सेहत के लिहाज से यह तमाम मशरूम फायदेमंद है. पेटरवार, गोमिया समेत जिला में टेकनस, छाती, चिरको, कढानी, बड़का, मुरगा, कमार, फूटका प्राकृतिक रूप से जंगल में उत्पादित होती है. इसके स्ट्रेन की जानकारी नहीं है. इनका व्यवसायिक उत्पादन वर्तमान में नहीं किया जा सकता है. केवीके के वैज्ञानिक डॉ रंजय कुमार सिंह की माने तो देशी मशरूम के इस्तेमाल के पहले पहचान बहुत जरूरी है. कई बार देशी मशरूम का सेवन सेहत के लिए घातक भी हो सकता है. विज्ञान के दृष्टिकोण से फार्म में उत्पादित मशरूम ही अच्छा होता है.
रूगड़ा मशरूम के प्रिजर्वेशन में मिली सफलता
वहीं बिरला इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी-मेसरा (रांची) के बायो तकनीक विभाग के अध्यक्ष डॉ रमेश चंद्र एक दशक से अधिक समय से देशी मशरूम रुगड़ा पर रिसर्च कर रहे हैं. बताते हैं : हर जिला की मिट्टी में अंतर होता है. कई मशरूम को खाया जाता है, कई मशरूम को खाना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है.
हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों को इसकी पहचान होती है. डॉ चंद्र बताते हैं : रुगड़ा का उत्पादन नेचरूली होता है. 03-04 दिन में रुगड़ा खराब होने लगता है. ऐसे में इसके प्रिजर्वेशन के लिए काम किया गया है. इसमें सफलता मिली है. डॉ चंद्र बताते हैं कि कल्टीवेशन पर काम हुआ है, लेकिन कल्चर क्रेक नहीं हुआ है.
फूटका का व्यवसायिक उत्पादन मुश्किल : डॉ रमेश चंद्र
डॉ चंद्र फूटका मशरूम पर भी काम कर रहे हैं. यह मशरूम पेटरवार प्रखंड के क्षेत्र में पाया जाता है. डॉ चंद्र बताते हैं : फूटका का व्यवसायिक खेती कर पाना अभी संभव नहीं है. वर्तमान में जो तकनीक उपलब्ध है, इसमें यह संभव नहीं है. डॉ चंद्र ने बताया : रूगड़ा व फुटका दोनों के व्यवसायिक खेती पर काम चल रहा है. ताकि, सालों भर उत्पादन हो सके.
डॉ चंद्र बताते है कि सरकार की ओर से इसका अप्रुवल अभी तक नहीं मिला है. पहले जो भी वर्क था, उसका प्रोजेक्ट सेंशन हुआ था लेकिन पैसा अभी तक नहीं मिला है. इंस्टीच्यूट के सपोर्ट से ही काम हो रहा है.
