दीपक सवाल
कसमार : किसी के हाथों में कामयाबी सौंपने से पहले ईश्वर भी न जाने कैसी-कैसी परीक्षा लेता है. झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की पुलिस अवर निरीक्षक (दारोगा) नियुक्ति प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता प्राप्त करने वाले निरंजन महतो की कहानी कुछ ऐसी ही है़ जिस दिन इन्हें दारोगा बहाली के लिए रांची के डोरंडा स्थित जैप-1 मैदान में दौड़ लगानी थी, उसी दिन इनकी मां घासु देवी का निधन हो गया़ एक तरफ मां की अर्थी पड़ी थी, तो दूसरी तरफ अपने बेटे को दारोगा बनाने का उसी मां का सपना था़
निरंजन ने इस विकट परिस्थिति में हिम्मत नहीं हारी़ पहले मां की अर्थी को कांधा दिया और फिर उसी मां के सपने को साकार करने का जज्बा लेकर दौड़ में भाग लेने गये. एक घंटा में दस किमी की दौड़ लगानी थी़ निरंजन ने समय पर दौड़ पूरी की और बहाली प्रक्रिया के अगले चरण में जाने में कामयाब रहे़ फिर आगे की प्रक्रियाओं में भी सफलता पायी़ निरंजन का हौसला, उनकी मेहनत और मां का आशीर्वाद का फल उन्हें मिला, जब अंतिम परिणाम में इनका नाम भी शामिल हुआ़ निरंजन महतो कसमार प्रखंड की बगदा पंचायत अंतर्गत रघुनाथपुर गांव निवासी नारायण महतो के पुत्र है़ं
तीन भाई व दो बहनों में सबसे छोटे हैं. सभी भाई-बहनों का विवाह हो चुका है़ निरंजन अविवाहित हैं. इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई़ 2009 में क्षेत्रनाथ उच्च विद्यालय, हरनाद से मैट्रिक, 2011 में बोकारो स्टील सिटी कॉलेज से आइएससी एवं 2014 में विस्थापित कॉलेज, बालीडीह से स्नातक की पढ़ाई पूरी की़ निरंजन ने बताया : स्नातक करने के बाद वह गांव आ गये़ घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी़ पिता लगभग 15 वर्षों से बेरोजगार हैं.
बड़े भाई संतोष कुमार महतो घर का खर्च उठाते हैं. स्नातक करने के बाद यह सोच कर घर आये कि स्थानीय स्तर पर कोई नौकरी करके घर चलाने में मदद करेंगे़ इसी बीच गांव के ही प्राइमरी टीचर सुभाष चंद्र महतो से उनकी मुलाकात हुई़ जब उन्हें इस बारे बताया तो उन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखने को सलाह दी़ इसके लिए न केवल प्रोत्साहित किया, बल्कि आर्थिक रूप से भी काफी मदद की़
इनकी मदद से ही 2015-17 सत्र में आइटीआइ, चास से फिटर ट्रेड में नामांकन कराया और इसमें कॉलेज टॉपर रहे़ इस दौरान अपने स्तर से प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में भी जुटे रहे़ 2017 में जब दारोगा की बहाली निकली तो निरंजन ने दारोगा बनने की ठानी़ इनके माता-पिता भी चाहते थे कि निरंजन दारोगा बन जाये, तो इससे बड़ी खुशी की बात कुछ नहीं हो सकती़ मां पूछती भी थी कि बेटा तुम दारोगा बन तो जाओगे न?
निरंजन को इस बात की खुशी है कि वह अपनी मां का सपना पूरा कर सका, लेकिन इस बात का दुख भी है कि इस खुशी को बांटने के लिए आज उसकी मां इस दुनिया में नहीं है़ निरंजन ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता के अलावा सुभाष चंद्र महतो को दिया़ कहा : उन्हें भरोसा है कि वे हर लिहाज से एक अच्छे सब-इंस्पेक्टर साबित होंगे.
