Syed Amjad Hussain: बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर सूफी इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को किताब के जरिए सामने लाने वाले युवा लेखक सय्यद अमजद हुसैन इन दिनों चर्चा में हैं. शेखपुरा जिले के जमुआरा गांव से ताल्लुक रखने वाले अमजद ने कम उम्र में ही लेखन और शोध को अपना रास्ता बनाया. उनकी किताब ‘बिहार और सूफीवाद’ ने उन्हें साहित्य और सूफी अध्ययन के क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई है.
राजमंगल प्रकाशन से प्रकाशित 308 पन्नों की यह किताब बिहार में सूफी परंपरा के विकास, विभिन्न सूफी सिलसिलों, खानकाहों, संतों की शिक्षाओं और सामाजिक भूमिका को समझने की कोशिश करती है. किताब की खासियत यह है कि इसमें इतिहास को स्थानीय स्मृतियों, पांडुलिपियों और रूहानी परंपराओं से जोड़कर देखने का प्रयास किया गया है.
कौन हैं सय्यद अमजद हुसैन?
सय्यद अमजद हुसैन बिहार के शेखपुरा जिले के जमुआरा गांव से आते हैं. उनके पिता सय्यद अहमद हुसैन समाजसेवा और व्यवसाय से जुड़े हैं. परिवार की अपनी साहित्यिक और रूहानी विरासत भी रही है. उनके दादा डॉ. सय्यद आशिक हुसैन मौलानगर खानकाह से जुड़े रहे, जबकि परदादा हाफिज मीर सय्यद अब्दुल अज़ीज़ और पूर्वज हज़रत मीर अब्दुल्लाह बिहारी व हज़रत सय्यद अहमद जाजनेरी धार्मिक और साहित्यिक परंपरा से जुड़े हुए थे.
अमजद लेखन के साथ इतिहास और सूफीवाद के स्वतंत्र शोधकर्ता के रूप में भी काम कर रहे हैं. उनकी विशेष रुचि बिहार की उन ऐतिहासिक परंपराओं में है, जिन्हें खानकाहों, दरगाहों, पांडुलिपियों और स्थानीय स्मृतियों में जगह मिली, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास में अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई.
‘बिहार और सूफीवाद’ ने दिलाई पहचान
किताब में चिश्ती, कादरी, सुहरावर्दी और नक्शबंदी समेत कई सूफी सिलसिलों की चर्चा की गई है. लेखक ने केवल चर्चित संतों तक सीमित रहने के बजाय बिहार के उन कई सूफी बुजुर्गों और स्थानीय परंपराओं को भी सामने लाने की कोशिश की है, जिनसे आम पाठक कम परिचित है.
अमजद ने सूफी इतिहास को सिर्फ पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा. खानकाहों और दरगाहों से जुड़ी परंपराओं, मौखिक स्रोतों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पांडुलिपियों को भी अपने अध्ययन का हिस्सा बनाया. किताब में इतिहास के साथ शायरी और रूहानियत का रंग भी दिखाई देता है. कई जगह काव्यात्मक पंक्तियों और शेरों के जरिए विषय को प्रस्तुत किया गया है.
पहले भी लिख चुके हैं बिहार पर
‘बिहार और सूफीवाद’ अमजद की पहली किताब नहीं है. इससे पहले वह ‘द इटर्नल्स ऑफ बिहार’ और उर्दू साहित्यकार अख्तर ओरेनवी की जीवनी ‘अख्तर ओरेनवी: बिहार में उर्दू साहित्य के निर्माता’ लिख चुके हैं. इससे उनके लेखन की रुचि और दायरा साफ होता है, जो बिहार के इतिहास, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत तक फैला हुआ है.
राष्ट्रीय स्तर पर भी मिली पहचान
लेखन और शोध के अलावा अमजद हुसैन को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है. रक्षा मंत्रालय की ओर से उन्हें 76वें गणतंत्र दिवस समारोह में अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था. एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक पहुंचना उनके लिए और उनके जिले के लिए खास उपलब्धि रही.
जमुआरा से शुरू हुआ अमजद का सफर अब बिहार की सूफी विरासत को किताबों के जरिए देश-दुनिया के पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश बन चुका है. उनकी कहानी बताती है कि इतिहास की तलाश के लिए बड़े शहर में होना जरूरी नहीं—कभी-कभी एक गांव से उठी आवाज भी भूली हुई विरासत को नई पहचान दे सकती है.
