दूध के कारोबार से नहीं हो रहा मुनाफा

चिंताजनक. डेयरी उद्योग से खुशहाली लाने में महंगाई का ग्रहण हाजीपुर : डेयरी के क्षेत्र में बेहतर मुनाफे की आस में दुग्ध उत्पादन के कारोबार से जुड़े किसान परिवार संकट में है. डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिलने, लागत खर्च में तेजी से हुई बढ़ोतरी और उसके अनुपात में दूध […]

चिंताजनक. डेयरी उद्योग से खुशहाली लाने में महंगाई का ग्रहण

हाजीपुर : डेयरी के क्षेत्र में बेहतर मुनाफे की आस में दुग्ध उत्पादन के कारोबार से जुड़े किसान परिवार संकट में है. डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिलने, लागत खर्च में तेजी से हुई बढ़ोतरी और उसके अनुपात में दूध की कीमत नहीं मिलने के कारण पशुपालकों को निराशा हाथ लग रही है. जिले में कृषि पर आधारित परिवारों के लिए पशुपालन ही जीविका का मुख्य आधार है.
आम तौर पर खेती-किसानी में लागत के अनुरूप उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने से पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में किसानों की दिलचस्पी बढ़ी है. इसके लिए सरकार की तरफ से कई महत्वाकांक्षी योजनाएं चलायी जा रही हैं. इन योजनाओं के अनुपालन में अफसरों की मनमानी भारी पड़ने लगी है. इसके चलते पशुपालकों व दुग्ध उत्पाद में लगे लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है.
सामग्रियों के दाम बढ़ने से लागत निकालना हुआ मुश्किल : डेयरी कारोबार से जुड़े उद्यमियों का मानना है कि अफसरशाही के कारण डेयरी उद्यमिता विकास योजना का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है. दूसरी ओर उत्पादन से जुड़ी सामग्रियों के दाम और मजदूरी की दर बढ़ जाने से यह कारोबार घाटे का रोजगार बनता जा रहा है. गेहूं की कटाई और दौनी में मशीनों का प्रयोग बढ़ने के बाद से भूसे का संकट बढ़ रहा है. तीन से चार सौ रुपये प्रति क्विंटल मिलने वाला भूसा अब सात से आठ सौ रुपये क्विंटल मिल रहा है. अन्य सामग्रियों की कीमत में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है.
इलाज के अभाव में पशुओं की हो रही मौत : पशुओं को रोग से बचाने के लिए टीकाकरण और इलाज की कारगर व्यवस्था नहीं होने के कारण पशुओं की मौत हो जाने पर पशुपालकों को भारी झटका लगता है. पशुओं में आम तौर पर खुरहा, खुरपा, मुंहपका रोग, लंगड़ी रोग, थनइल समेत अन्य प्रकार के रोग पाये जाते हैं.
इन रोगों का सर्वाधिक शिकार दुधारू पशु होते हैं. इन बीमारियों से बचाव के लिए किये जानेवाले टीकाकरण के मामले में पशु अस्पताल बेकार साबित हो रहे हैं. टीकाकरण और उचित इलाज के अभाव कई दुधारू पशुओं की जान चली जाती है. ऐसी स्थिति में पशुपालकों को 50 से 60 हजार रुपये की क्षति हो जाती है.
खस्ताहाल है पशु चिकित्सालय : पशुओं के इलाज के लिए जिले में 22 पशु चिकित्सालय, 44 उपकेंद्र तथा 21 गर्भाधान केंद्र हैं. डेयरी उद्योग को समृद्ध बनाने के लिए सहकारी संघ द्वारा दीर्घकालिक कार्य योजना भी बनायी गयी है. इसमें पशुओं के टीकाकरण और इलाज पर विशेष जोर दिये जाने की योजना है. इन सबके बावजूद पशुओं का समय पर इलाज भी नहीं हो पा रहा है. जिले के पशु चिकित्सालयों की स्थिति बेहद खराब है. इन केंद्रों में चिकित्सा सुविधाओं का घोर अभाव है.
डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए नहीं उठाया जा रहा कदम
लागत खर्च में तेजी से बढ़ोतरी, लेकिन दूध की कीमत नहीं बढ़ी
पशुओं की मौत हो जाने पर पशुपालकों को लग रहा भारी झटका
क्या कहते हैं आंकड़े
पशु चिकित्सालय-22
पशु चिकित्सा उपकेंद्र-44
पशु गर्भाधान केंद्र-21
पशु आहार की कीमतों में हुई है बेतहाशा वृद्धि
पशुपालक कहते हैं कि विगत पांच वर्षों में पशु आहार के दाम दोगुने हो गये, जबकि दूध की कीमत उस अनुपात में नहीं बढ़ी. चोकर 790 रुपये पैकेट, सुधा दाना 850 से 900 रुपये पैकेट और खल्ली 60 रुपये किलो की दर से मिल रही है. दुग्ध उत्पादक किसानों को वैशाली पाटलिपुत्र दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ द्वारा गाय का दूध 25 से 28 रुपये और भैंस का दूध 30 रुपये से प्रति लीटर के हिसाब से भुगतान किया जाता है. पशुपालकों का कहना है कि लागत खर्च के हिसाब से देखें, तो कम-से-कम 50 रुपये प्रति लीटर दूध की कीमत मिलनी चाहिए.
ऋण के मामले में बैंकों का रवैया सकारात्मक नहीं
दूध की उत्पादकता बढ़ाने और इससे गरीबों को जोड़ कर उनकी बदहाली दूर करने के लिए सरकार ने दुधारू पशु खरीदने के लिए ऋण योजना को आसान बनाया लेकिन बैंकों के अधिकारी इस मामले में सकारात्मक रुख नहीं दिखा रहे. पशु खरीद के लिए सरकार ने 15 दिनों के अंदर ऋण मुहैया कराने और 50 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान किया है. बैंकों की उदासीनता के कारण लाभुकों का इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है.

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