ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन बिल में ऐसा क्या है, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाता है?

Transgender Persons Amendment Bill 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकार बनाम भारत संघ के केस में यह कहा था कि हर किसी को गरिमा से जीने और अपना जेंडर तय करने का अधिकार है. अगर कोई व्यक्ति यह कहता है कि वह ट्रांसजेंडर है, तो उसे माना जाना चाहिए. 13 मार्च को सरकार ने संसद में एक बिल पेश किया, जो यह कहता है कि अब सिर्फ किसी व्यक्ति के कह देने भर से वह ट्रांसजेंडर नहीं हो जाएगा, उसे मेडिकल जांच करानी होगी, तभी उसे ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट मिलेगा.

Transgender Persons Amendment Bill 2026 : विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को एक्स पर एक पोस्ट लिखा और उसमें उन्होंने यह बताया कि वे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से संबंधित संशोधन विधेयक का विरोध करेंगे. उन्होंने कहा कि यह बिल ट्रांसजेडर के संवैधानिक अधिकारों और उनकी पहचान पर हमला है, इसलिए कांग्रेस इस विधेयक का विरोध करेगी. राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में लिखा है कि इस बिल में किए गए प्रावधान ट्रांसजेंडर्स को अमानवीय परीक्षाओं से गुजरने पर मजबूर करते हैं, इसलिए वे इस बिल के विरोध में खड़े होंगे.

ट्रांसजेंडर बिल में क्या है?

ट्रांसजेंडर की पहचान2019 का कानूननया संशोधन
पहचान का अधिकारखुद तय कर सकते थेहटाया जा रहा है
सर्टिफिकेट प्रक्रियाDM को सीधे आवेदनमेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बाद DM के पास आवेदन
मेडिकल जांचजरूरी नहींजरूरी
परिभाषाव्यापक सीमित

केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने 13 मार्च को ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक संसद में पेश किया है. अभी यह बिल संसद से पारित नहीं हुआ है, लेकिन ट्रांसजेंडर इस बिल का विरोध कर रहे हैं. विधेयक में ट्रांसजेंडर की पहचान सुनिश्चित करने के लिए कुछ व्यवस्थाएं की गई है, जो 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम से अलग हैं. 2019 के एक्ट में यह प्रावधान था कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से खुद को ट्रांसजेंडर घोषित कर सकता था और उसके बाद उसे डीएम से प्रमाणपत्र मिल जाता है. अब यह व्यवस्था समाप्त हो गई है और मेडिकल टेस्ट कराना जरूरी कर दिया गया है. मेडिकल टेस्ट के बाद ही डीएम किसी को ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट दे पाएंगे. साथ ही जबरन किसी को ट्रांसजेंडर बनाने पर सजा का प्रावधान किया गया है. साथ ही संशोधन विधेयक में यह भी बताया गया है कि कौन लोग ट्रांसजेंडर हो सकते हैं, इसमें अपनी मर्जी शामिल नहीं होगी, इस वजह से कई लोग ट्रांसजेंडर की श्रेणी से हटाए जा सकते हैं. इसी वजह से ट्रांसजेंडर इस संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर को दिया है अपनी पहचान सुनिश्चित करने का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने नालसा बनाम भारत संघ (2014) (NALSA v Union of India) (2014) के केस में यह फैसला सुनाया था कि खुद की पहचान मौलिक अधिकार है. कोई भी व्यक्ति यह तय कर सकता है कि वह पुरुष है, महिला है या फिर ट्रांसजेंडर है. इसके लिए किसी मेडिकल जांच की जरूरत नहीं पड़ती थी. सरकार अब जो बिल लेकर आई है उसमें मेडिकल जांच को अनिवार्य बना दिया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है. कोर्ट ने यह कहा था कि हर किसी को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, लेकिन विधेयक में मेडिकल जांच की बात आ गई है, जो इसे सरकारी प्रक्रिया बना रहा है, जो ट्रांसजेडर्स के लािए परेशानी का सबब बन रहा है.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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