पांच साल में खर्च 42.20 करोड़, परिणाम शून्य

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने और ग्राम न्यायालयों की स्थापना पर लग रहा ग्रहण हाल जिले की 288 ग्राम कचहरियों का अधिकतर ग्राम कचहरियों ने पांच वर्षों में एक भी मामला निष्पादित नहीं किया राज्य सरकार ने ग्राम कचहरियों के सरपंच और पंच का चुनाव कराया, लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निर्वाचित […]

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने और ग्राम न्यायालयों की स्थापना पर लग रहा ग्रहण

हाल जिले की 288 ग्राम कचहरियों का
अधिकतर ग्राम कचहरियों ने पांच वर्षों में एक भी मामला निष्पादित नहीं किया
राज्य सरकार ने ग्राम कचहरियों के सरपंच और पंच का चुनाव कराया, लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निर्वाचित किया था उनलोगों ने निर्वाचन के बाद अपने प्रतिनिधियों पर ही विश्वास नहीं किया. शायद ही ऐसी कोई ग्राम कचहरी हो, जहां लोगों ने अपने विवाद के समाधान के लिए लोगों ने ग्राम कचहरियों की शरण ली हो. अधिकतर ग्राम कचहरियों के पास पिछले पांच वर्षों में एक भी मामला निष्पादित नहीं किया गया. यानी लोगों ने अपने प्रतिनिधियों पर विश्वास जताने के बदले पुलिस और न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास जताया.
हाजीपुर : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने और ग्राम न्यायालयों की स्थापना के उच्चतम न्यायालय के निर्णय को अमली जमा पहनाने के लिए सरकार ने पिछले पांच साल में जिले की 288 ग्राम कचहरियों के संचालन पर खर्च 42 करोड़ 19 लाख 20 हजार रुपये किये, लेकिन परिणाम शून्य रहा. ग्राम कचहरियां अपने उद्देश्य में बुरी तरह विफल रहीं और सरकार का यह खर्च व्यर्थ साबित हुआ.
राष्ट्रपिता की अवधारणा : छोटे-छोटे विवाद को गांव के लोग गांव में ही बैठ कर हल कर दें, तो समाज में सौहार्द भी कायम रहे और न्यायालयों में विवादों की संख्या में कमी आयेगी. समाज में सौहार्द कायम रहने से उनका चतुर्दिक विकास होगा और अंतत: राज्य एवं देश का विकास होगा.
क्या था उच्चतम न्यायालय का आदेश : उच्चतम न्यायालय ने अपने एक आदेश में केंद्र सरकार से कहा था कि वह जगह-जगह ग्राम न्यायालयों की स्थापना करे. इसमें गांव के छोटे-छोटे विवाद को वहीं निष्पादित कर दिया जाये ताकि जिला और राज्य न्यायालय में महत्वपूर्ण मामलों के निष्पादन में अपना समय और शक्ति लगा सके. इससे देश में लंबित वादों की संख्या में कमी आ सकेगी.
क्या किया राज्य सरकार ने : राज्य सरकार ने ग्राम न्यायालयों की स्थापना करने के बजाय भारत की पुरातन न्याय व्यवस्था ग्राम कचहरी को ही शक्ति संपन्न बनाते हुए उसे कई मामलों पर संज्ञान लेने और सुनवाई का अधिकार दिया. इसके साथ ही ग्राम कचहरियों को विधिक सलाह देने के लिए विधि स्नातकों की न्यायमित्र के रूप में नियुक्ति की तथा लेखन कार्य के लिए न्याय सचिव की भी नियुक्ति किया, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात.
क्या हुआ अब तक : राज्य सरकार ने ग्राम कचहरियों के सरपंच और पंच का चुनाव कराया, लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निर्वाचित किया था उनलोगों ने निर्वाचन के बाद अपने प्रतिनिधियों पर ही विश्वास नहीं किया. शायद ही ऐसी कोई ग्राम कचहरी हो, जहां लोगों ने अपने विवाद के समाधान के लिए लोगों ने ग्राम कचहरियों की शरण ली हो. अधिकतर ग्राम कचहरियों के पास पिछले पांच वर्षों में एक भी मामला निष्पादित नहीं किया गया. यानी लोगों ने अपने प्रतिनिधियों पर विश्वास जताने के बदले पुलिस और न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास जताया.
कितना खर्च है एक ग्राम कचहरी के संचालन पर : राज्य सरकार प्रत्येक न्यायमित्र को सात हजार रुपये मासिक मानदेय, न्यायसचिवों को छह हजार रुपये मासिक मानदेय देती है. इसके अलावा पंच, उप सरपंच और सरपंचों के मानदेय पर लगभग 10 हजार रुपये मासिक खर्च करती है. इसके साथ ही ग्राम कचहरियों के मकान किराया, स्टेशनरी और फर्नीचर आदि पर औसतन प्रति ग्राम कचहरी 20 रुपये व्यय होता है. इस तरह जिले की 288 ग्राम कचहरियों के संचालन पर सरकार प्रतिवर्ष लगभग 2.93 करोड़ रुपये और पांच वर्षों में 43 करोड़ रुपये व्यय करती है.
कई ग्राम कचहरियां हुईं गबन की शिकार : अमूमन भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त रहनेवाले पंच परमेश्वर के नाम को कुछ लोगों ने बदनाम किया और कई ग्राम कचहरियों ने पंचों के मानदेय की राशि और कचहरी के मकान किराये की राशि का गबन कर लिया और संबंधित पंच मानदेय की राशि के लिए इधर-उधर भटकते रहे. कई सरपंचों ने ग्राम कचहरी के मकान का किराया सरकार से लेने के बावजूद नियमित रूप से न्यायालय का संचालन नहीं किया और किराये की राशि डकार लिये.
क्या था उद्देश्य
गांव के छोटे-छोटे विवाद को गांव के स्तर पर हल कर समाज में सामाजिक सौहार्द कायम रखने एवं न्यायालयों में विवादों की संख्या कम करने के उद्देश्य से सरकार ने ग्राम कचहरियों का चुनाव कराने के साथ ही उनके लिए एक ग्राम कचहरी सचिव और विधिक सलाह के लिए न्यायमित्रों की नियुक्ति की थी. लेकिन, ग्राम कचहरियों के पांच साल के कार्यकाल में ग्राम कचहरियों के कार्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि यह न तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने में सफल हुई और न ही उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के पालन में.

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