धूल फांक रही है निर्मल बनाने की योजना

उदासीनता. 288 ग्राम पंचायतों में 55 को प्रशासन ने घोषित किया है निर्मल ग्राम जिले की 288 ग्राम पंचायतों में 55 ग्राम पंचायतों को जिला प्रशासन द्वारा पूर्व से निर्मल घोषित किया जा चुका है. शेष पंचायतों के लिए कार्ययोजना तो बन कर तैयार है, लेकिन कार्रवाई अभी तक शून्य है. हालांकि निर्मल हो चुकीं […]

उदासीनता. 288 ग्राम पंचायतों में 55 को प्रशासन ने घोषित किया है निर्मल ग्राम

जिले की 288 ग्राम पंचायतों में 55 ग्राम पंचायतों को जिला प्रशासन द्वारा पूर्व से निर्मल घोषित किया जा चुका है. शेष पंचायतों के लिए कार्ययोजना तो बन कर तैयार है, लेकिन कार्रवाई अभी तक शून्य है. हालांकि निर्मल हो चुकीं पंचायतें भी कितनी निर्मल हुई हैं, यह जमीनी हकीकत से जाहिर है. जिन पंचायतों को निर्मल घोषित किया गया, उनमें शायद ही कोई निर्मल ग्राम पंचायत की कसौटी पर खरी उतरती हो.
हाजीपुर : प्रशासनिक उदासीनता के कारण जिले में ग्राम पंचायतों को निर्मल बनाने की योजना धूल फांक रही है. जिला प्रशासन पंचवर्षीय योजना के तहत जिले की सभी ग्राम पंचायतों को निर्मल बनाने की बात कहता है, लेकिन ग्राम पंचायतें कब और कैसे निर्मल होंगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. जिले की 288 ग्राम पंचायतों में 55 ग्राम पंचायतों को जिला प्रशासन द्वारा पूर्व से निर्मल घोषित किया जा चुका है. शेष पंचायतों के लिए कार्ययोजना तो बन कर तैयार है,
लेकिन कार्रवाई अभी तक शून्य है. हालांकि निर्मल हो चुकी पंचायतें भी कितनी निर्मल हुई हैं, यह जमीनी हकीकत से जाहिर है. इन पंचायतों को निर्मल घोषित किया गया, उनमें शायद ही कोई निर्मल ग्राम पंचायत की कसौटी पर खरी उतरती हो. बहरहाल, प्रशासनिक अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों के रवैये से ऐसा नहीं लगता कि वर्ष 2019 तक वैशाली जिले को खुले में शौच की प्रथा से मुक्त कराने का लक्ष्य पूरा हो सकेगा.
वर्ष 2015-16 बीत गया, 50 में एक पंचायत भी नहीं हुई निर्मल :
जिले की जो पंचायतें निर्मल घोषित हो चुकी हैं, उनके अलावा शेष बची 235 ग्राम पंचायतों के लिए वर्षवार कार्ययोजना बनायी गयी थी. कार्ययोजना के मुताबिक, वर्ष 2015-16 में 50, 2016-17 में 50, 2017-18 में 50 और 2018-19 में 50 ग्राम पंचायतों को निर्मल बनाया जाना है, बाकी 35 ग्राम पंचायतों को 2019-20 में निर्मल बनाने की योजना है.
योजना के तहत वर्ष 2015-16 के लिए जिले की गंगा तटीय ग्राम पंचायतों को प्राथमिकता दी गयी थी, ताकि उन पंचायतों को बहुप्रचारित गंगा स्वच्छता अभियान के साथ जोड़ा जा सके. वर्ष 2015-16 बीत गया, लेकिन, इस बीते वर्ष में जहां 50 ग्राम पंचायतों को निर्मल बनाने की योजना थी वहां एक भी पंचायत निर्मल घोषित नहीं हो सकी.
लक्ष्य प्राप्ति को लेकर गंभीर नहीं है स्वच्छता समिति : ग्राम पंचायतों को निर्मल बनाने के लिए गठित जिला जल एवं स्वच्छता समिति इस मामले में बेहद लापरवाह लगती है. समिति द्वारा लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जा सका, जिससे कि धरातल पर कुछ काम होता हुआ दिखे.
शौचालय निर्माण के मामले में तसवीर पूरी तरह निराशाजनक है. समिति के सचिव लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के कार्यपालक अभियंता है. समिति में उपविकास आयुक्त, ग्रामीण विकास अभिकरण के निदेशक, सिविल सर्जन, जिला कल्याण पदाधिकारी, जिला पंचायती राज पदाधिकारी, जिला सूचना एवं जनसंपर्क पदाधिकारी, जिला प्रोग्राम पदाधिकारी, आइसीडीएस तथा जिला शिक्षा पदाधिकारी बतौर सदस्य शामिल हैं.
निर्मल प्रखंड का हाल देख चुके हैं लोग : जिले के देसरी प्रखंड को निर्मल प्रखंड का दर्जा देते हुए 20 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी गयी थी. यह राशि स्वच्छता पर खर्च की जानी थी. सारे पैसे कागज पर खर्च कर दिये गये थे. कूड़ेदान से लेकर सोलर लाइट के नाम पर लाखों के खर्च दिखा दिये गये थे. जब जांच हुई, तो न कूड़ेदान का पता था, न लाइट का. जब राशि की उपयोगिता में भारी अनियमितता उजागर हुई, तो जिला प्रशासन के आदेश पर प्रखंड के तत्कालीन बीडीओ और लिपिक पर प्राथमिकी भी दर्ज हुई.
यह है निर्मल ग्राम पंचायत की कसौटी
संपूर्ण स्वच्छता अभियान जिसे अब स्वच्छ भारत मिशन के रूप में प्रचारित किया गया है. इसके तहत ऐसी ग्राम पंचायत, जिसमें शत प्रतिशत परिवार में शौचालय उपलब्ध हो, कोई भी स्कूल शौचालय विहीन न हो और जहां कोई भी व्यक्ति खुले में शौच करने नहीं जाता हो, पूरी पंचायत का वातावरण साफ-सुथरा हो ऐसी ही पंचायत को निर्मल ग्राम पुरस्कार दिया जाता है. ऐसी ग्राम पंचायतें, प्रखंड या जिला, जो शत-प्रतिशत शौचालय निर्माण पूरा कर लेते हैं,
वे इस पुरस्कार के हकदार होते हैं. पुरस्कार की राशि 50 हजार से लेकर 50 लाख रुपये तक है, जो निर्धारित मानकों के आधार पर दिये जाते हैं. यह राशि आबादी के आधार पर निर्धारित है. जिले में निर्मल ग्राम पुरस्कार पानेवाली पंचायतों को देखा जाये, तो इनमें एक भी पंचायत इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती.

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