देसरी : विषहर मेला के लिए अब कुछ ही दिन बचे हुए हैं. मेले की तैयारी शुरू हो गयी है. रेलवे स्टेशन मैदान में झूला, सर्कस, मौत के कुआं वाले आ गये हैं.
वहीं दर्जनों नर्सरी लग गयी है. जिसमें आम, लीची, कटहल के अलावा अन्य फलों एवं फूल के पौधा बिक्री के लिए आ चुके हैं. प्रत्येक वर्ष सावन माह के नागपंचमी के दिन देसरी स्थित विषहरी स्थान पर भव्य मेला का आयोजन होता है. राज्य के विभिन्न जगहों से लाखों लोग उस दिन विषहरी स्थान पर पूजा अर्चना एवं मां विषहरी की दर्शन करने आते हैं. लोगों में मान्यता है कि नागपंचमी के दिन विषहरी स्थान पर दूध-लावा चढ़ाने से हर मनोकामनाओं पूर्ण होती है.
विषहरी स्थान के संबंध में प्रचलित एवं ऐतिहासिक कथा है कि देसरी के दो व्यक्ति रोजी-रोटी की तलाश में तिरहुत गये थे. वहां कमला नदी के किनारे रात में दोनों ने विश्राम किया. सोने के दौरान झुंगुर पंडित को स्वपन में सर्प रूपी विषहरी देवी ने कही कि तुम मुझे यहां से दक्षिण की ओर ले चलो और किसी नदी के किनारे स्थापित कर दो, जिससे तुम पुण्य के भागी बनोगें. मैं तुम्हारी पगड़ी में फूल बनकर चलूंगी. प्रात जब झींगुर पंडित की आंखे खुली, तो अपने साथी चमन बैठा से इसकी चर्चा की. फिर झींगुर पंडित और चमन बैठा ने विषहरी देवी को सांप से फूल बनने का आग्रह किया और अपनी पगड़ी में फूल रखकर देसरी ले आया और उसे श्रावण मास के कृष्ण पक्ष के नागपंचमी के दिन देसरी के दक्षिण घाघरा नहर के किनारे एक पीपल के वृक्ष के नीचे पगड़ी से निकाल कर उस फूल को रख दिया.
विषहरी सांप के रूप में वहां रहने लगी. इसकी चर्चा आस पास के गांव में फैल गयी और लोगों ने अपार श्रद्धा के साथ दो पिंडी बनाकर दूध लावा चढ़ाने लगे और पूजा अर्चना शुरू कर दी. उस स्थान पर पूजा एवं दर्शन करने वाले लोगों की भीड़ इतनी जुट गयी कि एक मेला का रूप ले लिया. उसी दिन से प्रत्येक वर्ष श्रावण मास के कृष्ण पक्ष के नागपंचमी के दिन भव्य मेला का आयोजन होने लगा और लोग दूध लावा चढ़ा कर मन्नते मांगने लगे.
