सुपौल में 150 वर्षों से आस्था का केंद्र है वायसी का काली मंदिर

Supaul news: स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां काली के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है. यही वजह है कि वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मां को छागर (बकरे) की बलि अर्पित करते हैं. दीपावली के अवसर पर आयोजित काली पूजा के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

राघोपुर (सुपौल) से आशुतोष झा की रिपोर्ट:

Supaul news: जिले के राघोपुर प्रखंड स्थित वायसी पंचायत का प्राचीन मां काली मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है. करीब 150 वर्षों से यहां मां काली की पूजा-अर्चना की परंपरा लगातार जारी है. यह मंदिर न केवल सुपौल जिले के विभिन्न प्रखंडों बल्कि नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष श्रद्धा का केंद्र माना जाता है.

स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां काली के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है. यही वजह है कि वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मां को छागर (बकरे) की बलि अर्पित करते हैं. दीपावली के अवसर पर आयोजित काली पूजा के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

राजा ने दान में दी थी वायसी मौजा

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, तत्कालीन गढ़बनैली स्टेट के राजा ने अपनी बहन सिंहेश्वरी दाय को वायसी मौजा दान में दिया था. उसी समय से यहां मां काली की पूजा शुरू हुई. प्रारंभिक दौर में बांस और टीन से बने छोटे मंदिर में पूजा-अर्चना होती थी.

वर्ष 1967 में करजाईन बड़ियैत टोला निवासी बाबूजी बड़ियैत के सहयोग से मंदिर का पक्का निर्माण कराया गया. इसके बाद वर्ष 1977 में मंदिर का विस्तार और सौंदर्यीकरण किया गया. वर्तमान में मंदिर को और अधिक भव्य स्वरूप देने के लिए पुनर्निर्माण कार्य जारी है.

संगमरमर की प्रतिमा से बढ़ी मंदिर की भव्यता

बताया जाता है कि पहले मंदिर में मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती थी. वर्ष 1993 में वायसी निवासी कैलाश कुंवर की धर्मपत्नी सिंहेश्वरी देवी ने विधि-विधान के साथ मां काली की संगमरमर की प्रतिमा स्थापित कराई. इसके बाद मंदिर की पहचान और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई.

मेले और कुश्ती प्रतियोगिता की भी है परंपरा

मंदिर परिसर में लगने वाले मेले और पारंपरिक कुश्ती प्रतियोगिता की भी लंबी परंपरा रही है. स्वर्गीय कामेश्वर गुरुमैता और स्वर्गीय सुदुमलाल यादव के प्रयासों से काली पूजा के अवसर पर मेले और कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन शुरू हुआ, जो आज भी जारी है. 1960 और 1970 के दशक में यहां की कुश्ती प्रतियोगिताएं काफी प्रसिद्ध थीं.

दीपावली पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

पूजा समिति के संरक्षक प्रो. शिवनंदन यादव, पूर्व मुखिया प्रवीण कुमार मिश्र, अध्यक्ष तारानंद यादव, सचिव महानंद कुंवर और कोषाध्यक्ष चंदन मेहता ने बताया कि दीपावली की रात विशेष पूजा-अर्चना के साथ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. इस दौरान भजन-कीर्तन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक कुश्ती प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है.

उन्होंने कहा कि वायसी का काली मंदिर आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है.

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Published by: Shruti Kumari

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