गोसपुर में मनाया गया गुरुपूर्णिमा व व्यास पूर्णिमा

उन्होंने महाभारत, 18 पुराणों, ब्रह्मसूत्र और अंततः श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की

करजाईन. आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. इस शुभ अवसर पर गोसपुर ग्राम निवासी मैथिल पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने भगवान वेदव्यास जी की दिव्य जीवन गाथा और उनके आध्यात्मिक योगदानों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि द्वापर युग के अंत में महर्षि वशिष्ठ के पौत्र एवं पराशर मुनि के अंश से सत्यवती के गर्भ से भगवान वेदव्यास का अवतरण हुआ. उनका जन्म एक द्वीप में हुआ, जिससे उन्हें ‘द्वैपायन’ कहा गया, और उनके श्याम वर्ण के कारण वे कृष्णद्वैपायन कहलाए. वेदों का विभाग करने के कारण ही वे वेदव्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए. आचार्य मिश्र ने बताया कि वेदव्यास जी ने हिमालय की गोद में बद्रीवन के तपोभूमि में अपना आश्रम स्थापित किया और वहीं रहकर चार वेदों का विभाग किया. उन्होंने महाभारत, 18 पुराणों, ब्रह्मसूत्र और अंततः श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की. भागवत महापुराण के माध्यम से ही उन्हें आत्मिक संतुष्टि मिली और जीवों के परम कल्याण का मार्ग प्रशस्त हुआ. उन्होंने कहा, भगवान वेदव्यास समस्त धर्मों के मूल हैं. वे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के त्रिवेणी संगम हैं. उनके श्रीचरणों में चित्त को समर्पित कर ही धर्म का परम फल प्राप्त होता है. उन्होंने यह भी कहा कि वेदव्यास नित्य, अमर और समस्त उपासना मार्गों के आचार्य हैं, जो साधकों की निष्ठा का पोषण करते रहते हैं. इस अवसर पर आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने गुरुपूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे इस दिन आत्मचिंतन, सत्संग, और गुरु वंदना के माध्यम से जीवन को दिशा दें.

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