150 वर्षों से हो रही बड़ी दुर्गा स्थान में मां की आराधना

बड़ी दुर्गा स्थान न केवल श्रद्धा और विश्वास का केंद्र है, बल्कि यह सुपौल का बन चुका है धार्मिक और सांस्कृतिक धरोह

– बड़ी दुर्गा स्थान न केवल श्रद्धा और विश्वास का केंद्र है, बल्कि यह सुपौल का बन चुका है धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर सुपौल. जिला मुख्यालय के वार्ड नंबर 11, निराला नगर स्थित बड़ी दुर्गा स्थान की महिमा अपरंपार मानी जाती है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. स्थानीय परंपरा के अनुसार, इस स्थान पर पिछले 150 वर्षों से अधिक समय से शारदीय नवरात्र के अवसर पर मां दुर्गा की विधिवत पूजा की जा रही है. बताया जाता है कि वर्ष 1871 में यहां दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी. वर्ष 1870 में जब सुपौल, भागलपुर जिले का अनुमंडल बना, तब यहां नियुक्त बंगाली कर्मी सुनील चक्रवर्ती अपने परिवार के साथ आए थे. वे माता दुर्गा के अनन्य भक्त थे. उन्होंने ही वर्ष 1871 में कोलकाता से मां दुर्गा की खांड़ (तलवार) लाकर यहां ध्वजा स्थापित करते हुए पूजा-अर्चना प्रारंभ की थी. बाद में स्थानीय लोगों की मांग पर राजा सुरेंद्र नारायण सिंह ने मंदिर के लिए जमीन प्रदान की. शुरूआत में यहां फूस और फिर चदरा के घर में पूजा होती रही. लंबे समय बाद स्थानीय निवासी एवं स्टेट बैंक कर्मी स्व जग्गु मुखिया की अगुवाई में जनसहयोग से पक्का मंदिर बनवाया गया. भव्य मंदिर का निर्माण शारदीय नवरात्र में यहां हजारों की संख्या में भक्त उमड़ने लगे. बढ़ती आस्था को देखते हुए वर्ष 2016 में पूजा समिति एवं स्थानीय नागरिकों ने नेपाली मंदिर की तर्ज पर भव्य दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया, जो आज भी भव्य स्वरूप में मौजूद है. आस्था के चमत्कार स्थानीय लोग बताते हैं कि तटबंध बनने से पूर्व कोसी की बाढ़ से पूरा इलाका तबाह हो जाता था. नदी की धारा मंदिर के बगल से गुजरती थी, लेकिन कभी भी मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचा. इसी कारण लोगों की आस्था और भी प्रगाढ़ हो गई. कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्व में रात के समय मंदिर परिसर में एक सर्प दिखाई देता था, जो मंदिर की ध्वजा के पास जाकर विराजमान हो जाता था. सुबह होते ही वह अदृश्य हो जाता था. भक्त इसे मां दुर्गा की शक्ति का प्रतीक मानते थे.

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