मनोकामना पूरी होने पर मां काली को दी जाती है छाग बलि

दो-दो कमेटी गठित कर भव्य तरीके से की जाती है तैयारी

– गोविंदपुर स्थित दक्षिणेश्वरी काली मंदिर भक्तों के लिए बना है आस्था का केंद्र -दिवाली से लेकर भाइदूज तक भव्य मेले का किया जाता है आयोजन बलुआ बाजार. गोविंदपुर स्थित दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में हर साल दीपावली से लेकर भाईदूज पर्व तक श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना रहता है. देश ही नहीं विदेशों से भी बड़ी संख्या में इस मौके पर श्रद्धालु मां काली के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. दूसरे प्रदेश में रहने वाले लोग इस पूजा के आगमन का प्रतीक्षा करते हैं और पूजा के दौरान अपने घर लौटते हैं, जिससे भी लोगों के बीच एक अलग ही प्रकार का उत्साह देखी जाती है. इस बार पूजा को सफलतापूर्वक अंतिम रूप देने के लिए मंदिर कमेटी द्वारा आयोजन की तैयारी जोर-शोर से की जा रही है. दीपावली की रात मंदिर परिसर में निशा बलि में आसपास से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. इसके बाद निरंतर मंदिर में पाठ होते रहता है. ऐसी मान्यता है कि गोविंदपुर वाली काली मैया के इस दरबार में भक्तों की सभी मुरादें पूरी होती है. इसी आस्था के कारण मिथिलांचल क्षेत्र के अलावा पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं. दिवाली से लेकर भाइदूज पर्व तक मंदिर परिसर में भव्य मेले का आयोजन होता है. साल 2007 में श्यामा देवी द्वारा मां काली मंदिर में संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित की गयी है. इसमें मां काली के अलावा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा भी स्थापित है. इस मंदिर के पुजारी पंडित क्षमानाथ ठाकुर हैं जो अपने पूर्वज पंडित विद्यानाथ ठाकुर के समय से इस मंदिर की पूजा और अनुष्ठान करते आ रहे हैं. पंडित क्षमानाथ ठाकुर ने बताया कि दूर-दूर से श्रद्धालु मां काली की पूजा-अर्चना करते हैं और मनोकामना पूरी होने पर बलि चढ़ाते हैं. मंदिर की स्थापना के बाद सहायता के लिए वर्ष 1975 में ग्रामीणों की विशेष पहल पर कालिका नाट्य कला परिषद की स्थापना की गई थी. इसका नेतृत्व ग्रामीण राजेंद्र झा ने की, जिसमें अन्य लोगों ने भी अपनी सक्रियता को निभाई. वर्तमान में अध्यक्ष पद पर अमित कुमार हैं, जबकि कोषाध्यक्ष अजय ठाकुर और संरक्षक सुमन कुमार हैं. मंदिर समिति और गोविंदपुर युवा संस्कृति मंच के बैनर तले काली पूजा पर तीन दिवसीय मैया जागरण आयोजन किया जाता. इस बार मंगलवार, बुधवार और गुरुवार को होना सुनिश्चित है. यहां मुख्य रूप से दिवाली की मध्य रात्रि की पूजा के दौरान एक हजार से अधिक छाग बलि दी जाती है. वर्ष 1925 में लोगों ने शुरू की पूजा गोविंदपुर मां काली मंदिर लगभग 100 वर्षों से अधिक पुराना है. सन 1925 में पंडित विद्यानाथ ठाकुर, बलदेव झा, मुक्तिनाथ झा, लक्ष्मीकांत मिश्र व चुनचुन ठाकुर सहित अन्य ग्रामीणों ने मिलकर इस पूजा की शुरुआत की थी. अब धीरे-धीरे वृहद स्तर पर पूजा का आयोजन किया जाता है. बताया जाता है कि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु मां काली के समक्ष अपनी मनोकामनाएं रखते हैं और पूरी होने पर यहां आकर छाग बलि देते हैं. दीपावली की रात माता को स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत किया जाता है और पूरे विधि पूजा अर्चना की जाती है. भाईदूज के दिन मां काली मंदिर परिसर में छाग बलि की परम्परा है. इस दिन आसपास से सैकड़ों श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर आकर छाग बलि दी जाती है. वहीं भाई दूज के अगले दिन माता की पूजा अर्चना कर विसर्जन किया जाता है. दो-दो कमेटी गठित कर भव्य तरीके से की जाती है तैयारी पूजा के शुरू होने से एक महीने पहले मंदिर कमेटी का गठन किया जाता है. इसमें सर्वसम्मति से अध्यक्ष सहित अन्य पदों का चुनाव होता है. इस बार मंदिर कमेटी के अध्यक्ष पद का दायित्व अमित कुमार को सौंपा गया है. वहीं पूजा में दो-दो कमेटी यहां के रूपरेखा को तय करते हैं, जहां एक ओर कालिका नाट्य कला परिषद कमेटी पूजा अर्चना में विधिवत दायित्व को निभाते हैं तो वहीं युवा संस्कृत मंच के दर्जनों युवा सदस्य द्वारा पूजा के दौरान आयोजित कार्यक्रम का मोर्चा संभालते हैं और मेला आयोजन में हर एक गतिविधि सहित श्रद्धालुओं उपस्थिति में उनके प्रति सुरक्षा व्यवस्था प्रदान करना सुनिश्चित करते हैं. ग्रामीण नवसुंदर मिश्र, अमर ठाकुर, निर्भय नाथ ठाकुर,अवधेश झा, जयभद्र झा, उपेन्द्र झा, सुबोध झा, प्रभाष झा, चंदन झा, शैलेश झा, लाल झा, मानव ठाकुर, जयंत ठाकुर, अंकित आनंद, रौशन ठाकुर, शत्रुघ्न ठाकुर, रौशन ठाकुर, ऋषिकेश ठाकुर, रवि ठाकुर, आयुष ठाकुर, शांतनु ठाकुर, विश्वाश कौशिक, आनंद मिश्रा, दीक्षित राज, निशांत झा, उज्ज्वल आनंद, आशु, बोसकी ठाकुर, मनोरंजन झा आदि हर साल इस पूजा आयोजन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं.

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By RAJEEV KUMAR JHA

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