सीवान का ऐतिहासिक मंदिर है बुढ़िया माई

शहर के गांधी मैदान मार्ग पर स्थित बुढ़िया माई मंदिर आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बन चुका है. यह मंदिर कभी “जंगली माई” के नाम से प्रसिद्ध था और इसका इतिहास सौ वर्ष से भी अधिक पुराना बताया जाता है.

तिनिधि,सीवान.शहर के गांधी मैदान मार्ग पर स्थित बुढ़िया माई मंदिर आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बन चुका है. यह मंदिर कभी “जंगली माई” के नाम से प्रसिद्ध था और इसका इतिहास सौ वर्ष से भी अधिक पुराना बताया जाता है. यह सीवान का इकलौता बुढ़िया माई मन्दिर है, जहां वृद्ध रूप की पूजा होती है. यही वजह है कि यह मंदिर सीवान ही नहीं बल्कि पूरे बिहार में प्रसिद्ध है. सीवान शहर से गुजरने वाले अधिकांश लोग बुढ़िया माई का दर्शन करने यहां रुक जाते हैं. बुढ़िया माई का दर्शन कर सफर शुरू करना शुभ मना जाता है.कहा जाता है कि उस समय यह इलाका घने जंगलों और जंगली जानवरों से भरा रहता था.इन्हीं जंगलों के बीच जंगली माई का छोटा सा मंदिर था, जहां स्थानीय महिलाएं शुक्रवार और सोमवार को पूजा करने जाती थीं. धीरे-धीरे आसपास आबादी बसने लगी और मंदिर का महत्व बढ़ता गया..लोग बताते हैं कि सन 1919 में भक्त रामहीत राम कसेरा ने यहां कुआं खुदवाया ताकि जल की सुविधा हो सके. बाद में 1926-27 में सीताराम साह ने मंदिर का पक्का निर्माण कराया और मिट्टी की मूर्ति स्थापित कराई समय के साथ जंगल कटने लगे और सीवान शहर का विस्तार हुआ, उसी अनुपात में माई की महिमा भी दूर-दूर तक फैल गई.दशहरा और सावन में विशेष पूजा का आयोजन शुरू हुआ.स्थानीय शिक्षक मोहन प्रसाद श्रीवास्तव का विशेष योगदान रहा.गंभीर बीमारी से ग्रसित होने के बाद उन्होंने मंदिर को ही अपना निवास बना लिया और मां की कृपा से स्वस्थ हो गए. तब से वे “गुरुजी” के नाम से प्रसिद्ध हुए और 1968 से नियमित रूप से शनिवार को विशेष पूजा का आयोजन करने लगे. यह परंपरा आज भी जारी है.1992 में गुरुजी और स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ. इसी वर्ष एक भव्य यज्ञ और पूजा के दौरान पहली बार “बुढ़िया माई” नाम से निमंत्रण पत्र छपा और तभी से यह नाम स्थायी हो गया. शनिवार की शाम को भक्तजन नारियल लेकर मंदिर पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं. श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती.बुढ़िया माई मंदिर न केवल धार्मिक स्थल है बल्कि सीवान की आस्था और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है.

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Author: DEEPAK MISHRA

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