Siwan News: (अरविंद कुमार सिंह की रिपोर्ट) एक तरफ सरकार ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘बाल श्रम निषेध’ जैसे अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च कर बच्चों का भविष्य संवारने का दावा करती है. वहीं दूसरी ओर सीवान की सड़कों पर हकीकत कुछ और ही तस्वीर दिखा रही है. यहां नन्हे हाथ किताबों की जगह कूड़े के ढेर में प्लास्टिक और कबाड़ तलाशते नजर आते हैं.
सुबह ठेला लेकर निकलते हैं मासूम
शहर के कई इलाकों में चार-पांच बच्चों की टोली रोज सुबह ठेला लेकर निकलती है. दिनभर ये बच्चे कूड़े के ढेर में प्लास्टिक, बोतल, लोहा और कबाड़ खोजते हैं. शाम को जो कुछ मिलता है, उसे बेचकर परिवार का पेट भरने की कोशिश करते हैं.
किताबों की जगह हाथों में कचरे की बोरी
इन बच्चों के हाथों में कॉपी-किताब नहीं, बल्कि कचरे से भरी बोरियां दिखाई देती हैं. स्कूल की घंटी की जगह कबाड़ दुकानों पर मोलभाव करते ये बच्चे समाज और व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं.
6 से 12 साल के बच्चे उठा रहे जिंदगी का बोझ
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें से अधिकतर बच्चों की उम्र 6 से 12 साल के बीच है. जिस उम्र में बच्चों को स्कूल और खेल के मैदान में होना चाहिए, उस उम्र में वे गंदगी और बीमारियों के बीच जिंदगी से संघर्ष कर रहे हैं.
बिना जूते-मास्क के बीमारी के बीच काम
कचरा बीनने वाले इन बच्चों के पास न जूते हैं, न दस्ताने और न ही मास्क. कांच और लोहे से कटने का खतरा हर समय बना रहता है. संक्रमण और बीमारियों का डर भी है, लेकिन गरीबी और भूख के आगे ये मजबूर हैं.
सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल
‘मध्याह्न भोजन योजना’, ‘निःशुल्क शिक्षा’ और ‘बाल श्रम निषेध कानून’ जैसी योजनाएं कागजों पर तो चल रही हैं, लेकिन इन बच्चों तक उनका लाभ पहुंचता नहीं दिख रहा. आंगनबाड़ी केंद्र, स्कूल और बाल कल्याण समिति की सक्रियता पर भी सवाल उठ रहे हैं.
गरीबी और नशे ने छीना बचपन
स्थानीय लोगों का कहना है कि ज्यादातर बच्चे झुग्गी-झोपड़ियों और ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले परिवारों से आते हैं. कई मामलों में माता-पिता की गरीबी और नशे की लत के कारण बच्चों को पढ़ाई छोड़कर कचरा बीनना पड़ रहा है.
प्रशासन चाहे तो बदल सकती है तस्वीर
स्थानीय लोगों का मानना है कि जिला प्रशासन सर्वे कराकर इन बच्चों को स्कूलों से जोड़ सकता है. चाइल्ड लाइन 1098 और श्रम विभाग की टीम को जमीनी स्तर पर अभियान चलाकर बच्चों का रेस्क्यू करना होगा.
वरना कूड़े में दब जाएगा इनका भविष्य
सिर्फ योजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर लागू करने से ही इन बच्चों का बचपन बचाया जा सकता है. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इन मासूमों का भविष्य भी कूड़े के ढेर में दबकर रह जाएगा.
