Siwan News (अफजल अनवर) : प्रखंड क्षेत्र के पोखरा गांव स्थित सरकारी नलकूप पिछले दस साल से बंद होने से किसानों को खेतों की पटवन की समस्या एक गंभीर समस्या बन गया है. निजी नलकूप के सहारे किसान खेतों की सिंचाई कर रहे हैं. बारिश नहीं होने पर किसानों के लिए वरदान साबित होने वाले ये सरकारी नलकूप पिछले सात सालो से किसानों के लिए बस दिखावे के लिए रह गए हैं.पोखरा गांव में एक समय था कि सरकारी नलकूप होने से लोग अपने खेती का सिचाई समय समय पर कर लेते थे. लेकिन वही अब इस महंगाई के दौर में किसान अपने खेतों के सिचाई करने में असमर्थ है जिन लोगो के पास निजी नलकूप है वे लोग तो अपना खेती कर लेते है, लेकिन जिनके पास पटवन का कोई उचित सुविधा नहीं है. उनलोगों के खेतों की सिंचाई नहीं हो पाता है.
किसानों के काम नहीं आया सरकारी नलकूप
एक तरफ सरकार का कहना है कि किसानों को लाभ पहुंचाएं बिना देश का विकास संभव नहीं है. किसानों की सिंचाई को ले प्रखंड के पंचायत में राजकीय नलकूप लगाया गया था. इस नलकूप को बिजली की आपूर्ति करने के लिए ट्रांसफार्मर लगाया गया.लेकिन, अपने स्थापना काल से हीं यह राजकीय नलकूप कभी किसानों के लिए कारगर साबित नहीं हुआ.पंचायत के एक छोर पर लगा यह राजकीय नलकूप लाखों रुपए खर्च के बावजूद किसानों के लिए करीब एक दशकों से नकारा हीं बना हुआ है.आज भी नलकूप के संचालन के लिए कर्मचारी तैनात है. वह कर्मचारी कौन है किसी को पता भी नहीं है.वह कभी कभार आता है और घूम फिर कर चला जाता है. वर्षों से सफाई नहीं होने से स्टेट बोरिंग के आसपास जंगल उग आया है.जो उसे चारों तरफ से ढक दिया है.
फिर ठप हुई सिंचाई व्यवस्था
हालांकि कुछ दिनों तक किसानों के प्रयास से इस बोरिंग के पानी से आसपास के खेतों की सिंचाई की गई, लेकिन कुछ दिनों बाद यह पूरी तरह से ठप्प हो गया. वहीं दूसरी तरफ सरकार की अनदेखी के कारण असमर्थ किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने कारण कर्जो के बोझे तले दबते दिखाई दे रहे हैं.गांव में लगे नलकूप बंद होने के कारण किसानों को फसलों की पटवन करने में भारी परेशानिया हो रहा है. इनके पास निजी नलकूप है वो अपने फसलों की सिंचाई कर लेते है लेकिन जो किसान आर्थिक रूप से कमजोर है. उनको खेतों की सिंचाई करने में जेब ढीली हो जाती है.
प्रति बीघा पानी के लिए चुकाने पड़ रहे 400 रुपये
ऐसे में सिंचाई उनके सामने एक बड़ी समस्या बनी हुई है. किसानों की खेती में घाटा हो जाने से कर्ज में डूब जाते है. उन्हें दूसरों के नलकूप से प्रति बीघा चार सौ रुपये की दर से खेत में पानी पटवन करनी पड़ती है. किसान पैसे की तंगी कारण पटवन नहीं कर पाते है. इससे खेतों में लगे फसल सुख जाती है.किसानों का कहना है कि डीजल, बिजली और खाद-बीज की बढ़ती कीमतों ने लागत को और बढ़ा दिया है. मौसम की अनिश्चितता के कारण फसल खराब होने का खतरा लगातार बना रहता है. उचित सरकारी सहायता, सिंचाई सुविधाएं और बाजार में सही दाम नहीं मिलने से किसान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं.
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