सीवान के श्यामदेव नारायण की वीरगाथा, अंग्रेजी हुकूमत से टकराए तो मिली आजीवन कालापानी की सजा

Shyamdev Narayan: सीवान के सिसवन क्षेत्र के श्यामदेव नारायण ने गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति का मार्ग चुना. पटना षड्यंत्र केस में उन्हें कालापानी की सजा हुई, जहाँ उन्होंने चार साल कठिन कारावास झेला.

Shyamdev Narayan: देश की आजादी की लड़ाई में सीवान जिले के सिसवन क्षेत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इस धरती ने ऐसे कई स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया और अपना जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया. इन्हीं वीर सेनानियों में भागर गांव के श्यामदेव नारायण उर्फ राम सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है.

श्यामदेव नारायण की कहानी गांधीजी के विचारों से प्रभावित एक किशोर के क्रांतिकारी आंदोलन तक पहुंचने की कहानी है. बाद में उन्होंने भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभायी और ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई का सामना करते हुए कालापानी की कठोर सजा भी भुगती.

1917 में गांधीजी की सभा ने बदली जिंदगी की दिशा

भारत सरकार के स्वतंत्रता सेनानियों पर आधारित Unsung Heroes संकलन के अनुसार श्यामदेव नारायण का जन्म 5 अक्टूबर 1905 को सीवान जिले के सिसवन क्षेत्र के भागर गांव में हुआ था. वर्ष 1917 में सीवान में महात्मा गांधी की एक सभा में उन्होंने गांधीजी को सुना. गांधीजी के विचारों का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और यहीं से उनके भीतर देश की आजादी के लिए काम करने की भावना मजबूत हुई.

इसके बाद वह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारी समूहों के संपर्क में आये. उपलब्ध सरकारी संकलन में उल्लेख है कि वे योगेंद्र शुक्ल के समूह से जुड़े और क्रांतिकारी गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएं रामबिनोद सिंह, योगेंद्र शुक्ल और अन्य साथियों तक पहुंचाते थे.

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गांधी के विचारों से क्रांतिकारी रास्ते तक पहुंचा सफर

श्यामदेव नारायण का जीवन स्वतंत्रता आंदोलन के अलग-अलग धाराओं से जुड़ने का उदाहरण रहा. प्रारंभिक दौर में गांधीजी के विचारों से प्रभावित होने के बाद उनका संपर्क क्रांतिकारी संगठनों से हुआ.

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 1920 के दशक में वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे. बाद के वर्षों में उनका संबंध हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी HSRA से भी रहा. इस संगठन से उस दौर के कई प्रमुख क्रांतिकारी जुड़े हुए थे.

गुप्त सूचनाएं पहुंचाने का भी करते थे काम

क्रांतिकारी आंदोलन के दौरान श्यामदेव नारायण की भूमिका केवल प्रत्यक्ष गतिविधियों तक सीमित नहीं थी. उपलब्ध विवरण के अनुसार वे क्रांतिकारी साथियों तक महत्वपूर्ण सूचनाएं पहुंचाने का काम भी करते थे.

उस दौर में ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारी संगठनों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखती थी. ऐसे माहौल में गुप्त सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना भी बेहद जोखिम भरा काम था.

पटना षड्यंत्र केस में ब्रिटिश सरकार ने कसा शिकंजा

वर्ष 1932 में श्यामदेव नारायण ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई की जद में आये. भारत सरकार से संबंधित Unsung Heroes संकलन के अनुसार 22 अक्टूबर 1932 को उन्हें पटना षड्यंत्र केस में आरोपी बनाया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा देकर कालापानी भेजा गया.

यही वह दौर था जब अंग्रेजी हुकूमत क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के लिए कठोर कार्रवाई कर रही थी. श्यामदेव नारायण को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और उन्हें अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल भेज दिया गया.

कालापानी की सजा और सेलुलर जेल का कठिन दौर

श्यामदेव नारायण को अंडमान के पोर्ट ब्लेयर स्थित सेलुलर जेल भेजा गया. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण के अनुसार उन्होंने वहां करीब चार वर्ष तक कारावास झेला.

वर्ष 1936 में उन्हें 11 अन्य बंदियों के साथ हजारीबाग जेल स्थानांतरित किया गया. इसके बाद 1937 में कांग्रेस सरकार की ओर से राजनीतिक बंदियों की रिहाई के दबाव के बीच उन्हें जेल से रिहा किया गया.

कालापानी की सजा उस समय ब्रिटिश शासन की सबसे कठोर सजाओं में गिनी जाती थी. अंडमान की सेलुलर जेल में राजनीतिक बंदियों को बेहद कठिन परिस्थितियों में रखा जाता था.

जेल से निकलने के बाद मजदूरों के बीच किया काम

जेल से रिहा होने के बाद भी श्यामदेव नारायण का संघर्ष रुका नहीं. उपलब्ध विवरण के अनुसार उन्होंने झरिया और भेराटा नगर के मजदूर संगठनों के लिए काम किया.

इस दौर में उन्होंने मजदूरों के बीच संगठन और उनके अधिकारों से जुड़े कार्यों में भूमिका निभायी. यानी स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रियता केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक और श्रमिक संगठनों से भी जुड़ी रही.

भारत छोड़ो आंदोलन में भी रहे सक्रिय

वर्ष 1942 में जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का आह्वान किया, तब श्यामदेव नारायण फिर सक्रिय हुए. उपलब्ध सरकारी संकलन के अनुसार उन्हें उस दौरान गवर्नर के आदेश पर नजरबंद किया गया था.

लेकिन ब्रिटिश सरकार की निगरानी और कार्रवाई के बावजूद उन्होंने आंदोलन से अपना संबंध नहीं तोड़ा. 1942 से 1945 के बीच उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया.

'राम सिंह' नाम से भी जानी जाती थी पहचान

श्यामदेव नारायण को राम सिंह के नाम से भी जाना जाता था. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल कई कार्यकर्ताओं की तरह उन्होंने भी अलग नाम का इस्तेमाल किया.

उनकी पहचान और योगदान को बाद के वर्षों में स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दर्ज किया गया. वर्ष 2021 में भारत सरकार की ओर से स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों को समर्पित कार्यक्रमों के तहत श्यामदेव नारायण के नाम पर विशेष कवर भी जारी किया गया था.

एक महत्वपूर्ण सुधार: जन्म वर्ष 1950 नहीं, 1905

श्यामदेव नारायण की जीवनी से जुड़ी उपलब्ध विश्वसनीय सामग्री में उनका जन्म 5 अक्टूबर 1905 दर्ज है. इसलिए 5 अक्टूबर 1950 को जन्म होने की जानकारी सही नहीं मानी जानी चाहिए. इसी तरह भारत सरकार से संबंधित Unsung Heroes सामग्री में उनका जीवनकाल 5 अक्टूबर 1905 से 6 जुलाई 2000 दिया गया है.

6 जुलाई 2000 को हुआ निधन

देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले इस स्वतंत्रता सेनानी का निधन 6 जुलाई 2000 को हुआ. करीब एक सदी तक फैले उनके जीवन में स्वतंत्रता आंदोलन का संघर्ष, जेल यातना, कालापानी की सजा, मजदूर संगठन और आजादी के बाद का जीवन शामिल रहा.

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है श्यामदेव नारायण की कहानी

सिसवन के भागर गांव के श्यामदेव नारायण की कहानी केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की जीवनी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि किस तरह एक किशोर गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर देश की आजादी के आंदोलन में उतरता है और आगे चलकर अंग्रेजी हुकूमत की कठोरतम सजा भी झेलता है.

आज जब स्वतंत्रता आंदोलन के स्थानीय नायकों की चर्चा होती है, तब श्यामदेव नारायण का नाम सीवान की उस गौरवशाली परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें गांव-कस्बों के युवाओं ने भी देश की आजादी के लिए अपना भविष्य दांव पर लगा दिया था.

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By Abhay Kumar

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