सिसवन प्रखंड के बखरी स्थित आनंद बाग में आयोजित दो दिवसीय संत मेले के दूसरे दिन शनिवार को भी श्रद्धालुओं और मेलार्थियों की भीड़ उमड़ी रही. सुबह से ही आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग मेला परिसर में पहुंचने लगे. श्रद्धालुओं ने आनंद बाग परिसर स्थित संतों की समाधि पर मत्था टेककर पूजा-अर्चना की और सुख-शांति की कामना की.
भजन-कीर्तन और प्रवचन में जुटे श्रद्धालु
मेला परिसर में दिनभर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहा. संत सम्मेलन, भजन-कीर्तन और प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे. धार्मिक वातावरण के बीच मेले में लगी विभिन्न दुकानों पर भी लोगों की भीड़ रही.
खिलौने, मिठाई, चाट-पकौड़े, घरेलू सामान सहित अन्य दुकानों पर बच्चों और महिलाओं की विशेष भीड़ देखने को मिली. बच्चों ने झूले और अन्य मनोरंजन के साधनों का आनंद लिया.
दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु
मेले में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बताया कि बखरी का संत मेला क्षेत्र की पुरानी धार्मिक परंपरा और आस्था से जुड़ा है. यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग संतों का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.
मेले के दूसरे दिन भी आसपास के गांवों की गलियों और मेला परिसर में काफी चहल-पहल रही. देर शाम तक श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही.
सुरक्षा को लेकर तैनात रहा पुलिस बल
मेलार्थियों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया. मेला क्षेत्र में पुलिस बल की तैनाती की गयी थी. भीड़ को नियंत्रित करने के साथ यातायात व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए जवानों को लगाया गया.
आयोजन समिति के सदस्य भी व्यवस्था संभालने में जुटे रहे.
75 वर्षों से आस्था का केंद्र है बखरी का संत मेला
बखरी गांव स्थित आनंद बाग एवं सुंदर बाग मठ में लगने वाला संत मेला क्षेत्र की पुरानी आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है. सावन पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित होने वाले इस मेले में बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली समेत कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं.
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, यह परंपरा करीब 75 वर्षों से चली आ रही है.
संत जगन्नाथ दास से जुड़ा है आनंद बाग का इतिहास
बखरी के आनंद बाग मठ का इतिहास संत शिरोमणि जगन्नाथ दास से जुड़ा हुआ है. आनंद बाग में उनकी समाधि पर मंदिर बना हुआ है, जबकि सुंदर बाग में साधक प्रवर श्रीभगवान दास की समाधि स्थित है.
दोनों स्थानों से श्रद्धालुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है. संतों ने ध्यान, योग, सद्भावना और आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से समाज को संस्कार और भाईचारे का संदेश दिया.
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