बीज अनुदान नहीं मिलने से िकसानों में आक्रोश

शेखपुरा : अनुदानित दर पर किसानों को दिये गये बीज का अनुदान महीनों बाद नहीं मिलने से किसानों में आक्रोश पनपना शुरू हो गया है. चना प्रत्याण, मुख्यमंत्री तीव्र बीज विस्तार आदि योजना के तहत किसानों के बीच उपलब्ध कराया गया था. सरकार के योजना के तहत किसानों को बीज लेने के समय बीज की […]

शेखपुरा : अनुदानित दर पर किसानों को दिये गये बीज का अनुदान महीनों बाद नहीं मिलने से किसानों में आक्रोश पनपना शुरू हो गया है. चना प्रत्याण, मुख्यमंत्री तीव्र बीज विस्तार आदि योजना के तहत किसानों के बीच उपलब्ध कराया गया था. सरकार के योजना के तहत किसानों को बीज लेने के समय बीज की पूरी राशि विक्रेता को दिया जाना था, जिसे बाद में सरकार के अनुदान राशि के तहत उसके खाते में वापस किया जाना था.

किसानों ने प्रखंड कृषि कार्यालय से चना, गेहूं, मटर आदि का बीज दिसंबर माह में ही लिया था. इस मामले में किसान गोलबंद होना शुरू कर दिया है. किसान अपनी बीज के अनुदान राशि के लिए समाहरणालय के समक्ष प्रदर्शन करेंगे. उधर इस मामले में कृषि विभाग के सूत्रों ने बताया कि इस मद में प्राप्त राशि सभी प्रखंडों में भेजी जा चुकी है, जिसे शीघ्र ही किसानों के खाते में डाल दिया जायेगा. इस मामले में किसान जिला कृषि पदाधिकारी की भूमिका की आलोचना कर रहे हैं.
जल स्तर में कमी से संकट गंभीर
चापाकल और कुएं छोड़ रहे साथ
आदमी तो आदमी जानवरों की भी प्यास बुझानी मुश्किल
ट्यूबवेल से कुएं में पानी भर कर हर घर की जरूरतें हो रही पूरी
शेखपुरा : चेवाड़ा प्रखंड इस वर्ष जल संकट की अभूतपूर्व समस्या से जूझ रहा है. यहां पीने के पानी के लिए अभी से ही जद्दोजहद करनी पड़ रही है. जबकि मई और जून महीने की भीषण गरमी अभी बाकी है. प्रखंड के एकरामा गांव का हाल और भी बुरा है. यहां कृषि उपयोग के लिए बधारों में गाड़े गये प्राइवेट ट्यूबवेल में पाइप जोड़ कर पहले कुएं में पानी भरते हैं. इसके बाद हर घर में पानी की जरूरतें पूरी होती है.
इस बाबत स्थानीय ग्रामीण किशोरी यादव उर्फ व्यास जी ने बताया कि गांव से करीब आधे किमी दूर स्थित ट्यूबवेल से पाइप जोड़ कर कुएं को एक बार भरने से एक सप्ताह तक काम चलता है.
गांव में करीब ढाई हजार की आबादी है, जहां बमुश्किल 06 चापाकल चालू अवस्था में है. जल स्तर में भारी गिरावट से सरकारी और निजी चापाकल फेल हो रहे हैं. ऐसे में अभी से ही पानी के इस किल्लत की स्थिति को गांव के लोग एक माह बाद कैसे जूझेंगे. जबकि इस गांव के अधिकांश घरों में दो से लेकर 10-10 मवेशी है और सभी ताल-तलैया सूखे हुए है. तब भला मवेशियों के लिए पानी की जरूरतें कहां से पूरी होगी.
ऐसा कभी नहीं हुआ था :
करीब 80 साल की वृद्धा गंगा देवी बताती है कि पानी के लिए ऐसा हाहाकार कभी नहीं हुआ था. सन 1966 में जब अकाल का संकट आया था तब भी कुएं नहीं सूखे थे. लेकिन इस वर्ष जल स्तर की तेज रफ्तार से हो रही गिरावट को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी है. गांव में अभी से ही कई परिवार के लोग पलायन की सोचने लगे हैं.
ग्रामीण जलापूर्ति की योजना नहीं :
करीब चार साल पहले की घटना है. गांव के स्थानीय समाजसेवी ओर मुखिया पिंकू सिंह के पहल पर ग्रामीण जलापूर्ति योजना को स्वीकृति मिली थी. लेकिन जब निर्माण कंपनी वहां काम करने पहुंची तब कुछ असामाजिक तत्वों ने अपने अपराधिक कृत्यों से कार्य को बाधित कर दिया और फिर दोबारा आज तक उक्त योजना के लिए सरकारी पहलकदमी नहीं हो सकी.

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