पाप का धन विनाश की ओर ले जाता है : दीनानाथ शास्त्री

नर सेवा ही नारायण सेवा, सत्कर्म से ही महानता

तिलेश्वर महादेव मंदिर परिसर में चल रहा श्रीशंकर ज्ञान महायज्ञ अहंकार त्याग और सत्संग को बताया जीवन का आधार फोटो-9- प्रवचन करते दीनानाथ शास्त्री. प्रतिनिधि, सासाराम ग्रामीण शहर के तकिया स्थित श्री शंकर ज्ञान महायज्ञ के पांचवें दिन गुरुवार को आयोजित प्रवचन में दीनानाथ शास्त्री ने कहा कि जो दूसरों का हित चाहता है, उसका कभी अहित नहीं होता. सच्चे मन से ईश्वर को याद करने पर वह सहायता के लिए अवश्य आते हैं. उन्होंने कहा कि पाप से कमाया गया धन सदैव विनाश की ओर ले जाता है. उसका सुख क्षणिक होता है. ऐसे धन से सुख-सुविधा का सामान खरीदा जा सकता है, लेकिन सच्चा सुख नहीं मिलता. आज हर व्यक्ति धन के पीछे भाग रहा है, जबकि अंतिम समय में कफन में जेब नहीं होती. इसलिए जो कुछ है, उसे प्रभु के हित में लगाना चाहिए. उन्होंने कहा कि दूसरों की बुराई से कोई महान नहीं बनता. सत्कर्म से ही मनुष्य महान बनता है. छल-कपट से कमाया गया धन परिवार को पतन की ओर ले जाता है. मन को भटकने से समस्याएं उत्पन्न होती हैं, इसलिए उसे ईश्वर भक्ति में लगाना चाहिए. शास्त्री ने कहा कि दया से बड़ा कोई धर्म और सेवा से बड़ा कोई दान नहीं है. सत्संग से ही परलोक का मार्ग प्रशस्त होता है. अच्छे लोगों का साथ विकास की सीढ़ी है, जबकि अहंकार विनाश का कारण बनता है. उन्होंने रावण का उदाहरण देते हुए कहा कि अहंकार के कारण उसका भी अंत हुआ. उन्होंने कहा कि सच्चाई का मार्ग कठिन अवश्य है, पर दुर्लभ नहीं. माया का मोह त्यागकर सेवा को ही धर्म मानें, क्योंकि नर सेवा ही नारायण सेवा है. मौके पर डॉ. कामेश्वर सिंह पंकज, ई. जगदीश प्रसाद, विवेक कुमार सहित संत व श्रद्धालु मौजूद थे.

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Published by: Anurag sharan

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