Filaria Medicine: फाइलेरिया से बचाव के लिए चलाये गये मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) अभियान के दौरान सारण के रिविलगंज प्रखंड की भादपा पंचायत के रामपुर सिरिसिया गांव में लोगों की सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिला. फाइलेरिया रोधी दवा को लेकर आशंकित रहने वाले 65 घरों के योग्य सदस्यों ने अभियान के दौरान दवा का सेवन किया. स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, धार्मिक प्रतिनिधियों और पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफार्म के सदस्यों की पहल से यह बदलाव संभव हुआ.
दवा से इनकार की वजह बनी भ्रांतियां
आशा कार्यकर्ताओं के अनुसार, गांव के कई परिवार लंबे समय से फाइलेरिया की दवा लेने से इनकार करते रहे थे. लोगों के मन में बीमारी और दवा को लेकर कई तरह की भ्रांतियां थीं. उन्हें यह स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि दवा किस बीमारी से बचाव के लिए है और इसका सेवन क्यों जरूरी है.
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने समस्या को केवल दवा वितरण तक सीमित नहीं रखा. लोगों की आशंकाओं को समझने के लिए स्थानीय स्तर पर संवाद शुरू किया गया.
मस्जिद में हुई बैठक, लोगों ने खुलकर रखी बात
समुदाय की आशंकाओं को समझने के लिए मस्जिद के इमाम मोहम्मद शब्बीर हैदर खान की पहल पर मस्जिद परिसर में बैठक हुई. इसमें लोगों ने बताया कि आशा कार्यकर्ता घरों तक दवा पहुंचाती हैं, लेकिन दवा के फायदे और सेवन की आवश्यकता के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलने से उनके मन में कई सवाल बने रहते थे.
लोगों ने यह भी सुझाव दिया कि यदि उनकी कम्युनिटी के भरोसेमंद लोग दवा सेवन अभियान में साथ रहें, तो वे अधिक सहजता से दवा ले सकते हैं.
फाइलेरिया को वंशानुगत बीमारी मानते थे लोग
बैठक में यह भी सामने आया कि गांव के कई लोग फाइलेरिया को वंशानुगत बीमारी मानते थे. कुछ परिवारों में पहले फाइलेरिया के मामले सामने आने के कारण लोगों को लगता था कि यह बीमारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है.
वहीं, दवा को लेकर भी सुनी-सुनाई बातों के कारण लोगों में डर था. सही जानकारी के अभाव में कई परिवार दवा लेने से बचते रहे.
इमाम ने अपना अनुभव साझा कर बढ़ाया भरोसा
समुदाय की सोच बदलने में मस्जिद के इमाम मोहम्मद शब्बीर हैदर खान का व्यक्तिगत अनुभव महत्वपूर्ण रहा. उन्होंने बैठक में बताया कि वे स्वयं फाइलेरिया से पीड़ित रहे हैं.
उन्होंने लोगों को बताया कि सही जानकारी के अभाव में उन्होंने भी पहले दवा का नियमित सेवन नहीं किया था. बाद में स्थानीय सरपंच के सहयोग से चिकित्सक से परामर्श लिया और उचित उपचार शुरू किया, जिससे उन्हें राहत मिली.
अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने लोगों से फाइलेरिया की दवा को लेकर फैली भ्रांतियों से बचने और आशा कार्यकर्ताओं द्वारा उपलब्ध करायी जाने वाली दवा का सेवन करने की अपील की.
सरपंच ने खुद दवा खाकर दिया भरोसे का संदेश
समुदाय के बीच विश्वास कायम करने में स्थानीय सरपंच और पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफार्म के सदस्य मोहम्मद मिनहाज असगर खान ने भी अहम भूमिका निभायी. एमडीए अभियान के दौरान उन्होंने लोगों के सामने स्वयं फाइलेरिया रोधी दवा का सेवन किया.
सरपंच की इस पहल से लोगों का भरोसा बढ़ा और दवा को लेकर बनी कई आशंकाएं दूर हुईं.
कम्युनिटी की मांग को अभियान में किया शामिल
समुदाय के लोगों ने मांग रखी थी कि दवा सेवन के दौरान उनकी कम्युनिटी के भरोसेमंद लोग भी मौजूद रहें. स्वास्थ्य टीम ने उनकी मांग को स्वीकार करते हुए स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की.
डॉ. अरमान ने समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ संबंधित परिवारों से संपर्क किया और लोगों को भरोसेमंद लोगों की मौजूदगी में दवा सेवन के लिए प्रेरित किया.
65 घरों ने बदली अपनी सोच
स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय लोगों के बीच लगातार संवाद और सहभागिता का सकारात्मक परिणाम सामने आया. एमडीए अभियान के दौरान रामपुर सिरिसिया गांव के 65 घरों के योग्य सदस्यों ने फाइलेरिया रोधी दवा का सेवन किया.
जो परिवार पहले दवा लेने से इनकार कर रहे थे, वही अब अभियान के साथ जुड़ गये. यह बदलाव लोगों की आशंकाओं को सुनने और सही जानकारी देने के बाद संभव हुआ.
दवा से पहले जरूरी था संवाद
रामपुर सिरिसिया का अनुभव फाइलेरिया उन्मूलन अभियान के लिए महत्वपूर्ण सीख के रूप में सामने आया. यहां चुनौती दवा की उपलब्धता नहीं, बल्कि दवा और बीमारी को लेकर लोगों के मन में बनी भ्रांतियां और विश्वास की कमी थी.
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने लोगों की बात सुनी, स्थानीय सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व को साथ जोड़ा और समुदाय को अभियान का भागीदार बनाया. इसके बाद लोगों के व्यवहार में बदलाव देखने को मिला.
इस अभियान में प्रखंड स्तर पर वीवीडीएस घनश्याम यादव, पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफार्म के सदस्य, सीएचओ और जीविका सदस्य उषा देवी सहित अन्य लोगों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा.
भरोसे ने बदली वर्षों पुरानी सोच
रामपुर सिरिसिया में आया बदलाव केवल फाइलेरिया की दवा के सेवन तक सीमित नहीं है. यह बताता है कि किसी स्वास्थ्य अभियान में समुदाय का भरोसा और भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण होती है.
स्थानीय सरपंच का सहयोग, इमाम की पहल, चिकित्सक की भागीदारी, स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत और समुदाय के लोगों को अभियान से जोड़ने की रणनीति ने मिलकर दवा को लेकर बनी वर्षों पुरानी झिझक को दूर करने में मदद की.
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