Saran Ramswarupa Devi : सारण के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी वीरांगनाओं के साहस के बिना अधूरी है. अमनौर की बहुरिया रामस्वरूपा देवी ऐसी ही महिला थीं, जिन्होंने पति की मृत्यु के बाद सामाजिक बंदिशों को पीछे छोड़कर आजादी की लड़ाई में कदम रखा. गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करने से लेकर अंग्रेजी हुकूमत का सामना करने तक उन्होंने संघर्ष किया. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में मढ़ौरा की घटना उनकी वीरता की सबसे चर्चित मिसालों में शामिल है.
पति की मौत के बाद आजादी की लड़ाई में उतरीं
अमनौर की बहुरिया रामस्वरूपा देवी का नाम सारण के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है. वर्ष 1937 में उनके पति और अमनौर स्टेट के स्वतंत्रता सेनानी हरिमाधव प्रसाद सिंह का निधन हो गया था. पति के निधन के बाद उन्होंने सामाजिक परंपराओं और बंदिशों को पीछे छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला किया.
गांव-गांव जाकर लोगों को करती थीं जागरूक
रामस्वरूपा देवी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का अभियान शुरू किया. वह गांवों और टोले-मुहल्लों में जाकर लोगों को आजादी के आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित करती थीं. आंदोलन में सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें अंग्रेजी हुकूमत की कार्रवाई का सामना करना पड़ा और जेल भी जाना पड़ा.
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भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई अहम भूमिका
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ माहौल को तेज कर दिया था. इसी दौर में सारण की बहुरिया रामस्वरूपा देवी ने भी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. 16 अगस्त 1942 को मढ़ौरा की फैक्ट्रियों पर कब्जा करने और थाना पर तिरंगा फहराने की योजना बनाई गई थी.
महथा गाछी में हुई थी बड़ी सभा
18 अगस्त 1942 को मढ़ौरा स्थित महथा गाछी में एक सभा आयोजित की गई. सभा में बहुरिया रामस्वरूपा देवी ने लोगों को संबोधित किया. उनके भाषण के दौरान हथियारों से लैस ब्रिटिश सैनिकों की टुकड़ी वहां पहुंची और कार्रवाई शुरू कर दी.
गोलियों की बौछार के बीच भी नहीं डरीं
ब्रिटिश सैनिकों की कार्रवाई के बाद सभा में अफरातफरी मच गई. लोग इधर-उधर भागने लगे. लेकिन रामस्वरूपा देवी ने अपना स्थान नहीं छोड़ा और लोगों को साहस के साथ मुकाबला करने के लिए प्रेरित करती रहीं. उनके नेतृत्व और हौसले ने आंदोलनकारियों में फिर से जोश भर दिया.
‘करो या मरो’ का संदेश देकर लौटाई भीड़
बताया जाता है कि भागती भीड़ को रामस्वरूपा देवी ने महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के संदेश की याद दिलाई. उन्होंने लोगों को कायरता छोड़कर आंदोलन में डटे रहने के लिए ललकारा. उनकी आवाज सुनकर कई लोग वापस लौट आए और ब्रिटिश सैनिकों का विरोध शुरू कर दिया.
आंदोलनकारियों और ब्रिटिश सैनिकों के बीच हुआ संघर्ष
इसके बाद स्थिति और उग्र हो गई. आंदोलनकारियों ने ब्रिटिश सैनिकों का विरोध किया. उपलब्ध स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इस संघर्ष में कुछ ब्रिटिश सैनिकों की मौत हुई, जबकि आंदोलनकारी रामजीवन भी शहीद हुए. इस घटना ने मढ़ौरा और आसपास के क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन को और तीखा कर दिया.
यातनाएं भी झेलीं, लेकिन हौसला नहीं टूटा
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहने के कारण बहुरिया रामस्वरूपा देवी को अंग्रेजी शासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा. जेल जाने और यातनाएं झेलने के बावजूद उन्होंने आंदोलन से पीछे हटने के बजाय लोगों में स्वतंत्रता की भावना जगाने का काम जारी रखा.
आज भी गर्व से याद करते हैं लोग
बहुरिया रामस्वरूपा देवी की वीरता सारण के स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण स्मृतियों में शामिल है. अमनौर और मढ़ौरा क्षेत्र में आज भी उनकी कहानी लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका और उनके साहस की याद दिलाती है. उनकी गाथा यह बताती है कि आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने भी घर की दहलीज से बाहर निकलकर महत्वपूर्ण योगदान दिया था.
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