Mehta Gaachhi Gora Incident : सारण के मढ़ौरा की धरती 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठे विद्रोह की गवाह रही है. इसी दौर में महता गाछी में हुई गोलीबारी और उसके बाद अंग्रेज सैनिकों के साथ हुए संघर्ष को स्थानीय इतिहास में ‘महता गाछी गोरा कांड’ के नाम से याद किया जाता है. इस घटना में 18 वर्षीय क्रांतिकारी रामजीवन सिंह की गोली लगने से मौत हुई थी और इसके बाद भीड़ तथा ब्रिटिश सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था.
भारत छोड़ो आंदोलन ने मढ़ौरा में पकड़ी थी रफ्तार
अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के राष्ट्रव्यापी आह्वान के बाद मढ़ौरा में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ. शोधकर्ता विवेकानंद सिंह के अनुसार 15 और 16 अगस्त को छात्रों तथा स्थानीय लोगों ने कई सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती दी थी.
पोस्ट ऑफिस से थाने तक पहुंचा आंदोलन
आंदोलनकारियों ने पोस्ट ऑफिस, रेलवे स्टेशन, मालगोदाम, रजिस्ट्री ऑफिस और मढ़ौरा थाना सहित कई स्थानों पर विरोध जताया. इस आंदोलन में अमनौर एस्टेट की बहुरिया रामस्वरूप देवी की भूमिका भी महत्वपूर्ण बतायी जाती है. स्थानीय स्तर पर उनके नेतृत्व में लोगों की सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक रूप दिया.
18 अगस्त को महता गाछी में जुटी थी भीड़
18 अगस्त 1942 को मढ़ौरा के महता गाछी में एक बड़ी जनसभा आयोजित की गयी. बताया जाता है कि भारी बारिश के बावजूद सभा में बड़ी संख्या में क्रांतिकारी और आम लोग जुटे थे. सारण जिला कांग्रेस कमेटी की डिक्टेटर बहुरिया रामस्वरूप देवी इस सभा की मुख्य वक्ता थीं.
अचानक पहुंच गयी ब्रिटिश फौज की टुकड़ी
जनसभा के दौरान हथियारों से लैस ब्रिटिश सैनिकों की एक टुकड़ी वहां पहुंच गयी. स्थानीय विवरणों के अनुसार युवाओं ने सैनिकों से वापस लौटने को कहा. इसी दौरान एक ब्रिटिश सैनिक की ओर से गोली चलायी गयी, जिसमें लेरुआ गांव के 18 वर्षीय रामजीवन सिंह की मौत हो गयी.
रामजीवन सिंह की शहादत के बाद भड़का आक्रोश
रामजीवन सिंह की मौत के बाद सभा में मौजूद लोगों का आक्रोश भड़क उठा. विवरणों के अनुसार बहुरिया रामस्वरूप देवी के नेतृत्व में लोगों ने ईंट-पत्थरों और लाठी-डंडों से ब्रिटिश सैनिकों का विरोध किया. अचानक हुए इस प्रतिरोध से सैनिकों को पीछे हटना पड़ा.
मकई के खेत में छिपे छह ब्रिटिश सैनिक
स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार छह ब्रिटिश सैनिक भागकर मकई के खेत में छिप गये. इसके बाद भीड़ ने उनका पीछा किया. उपलब्ध विवरण बताते हैं कि निहत्थी भीड़ और ब्रिटिश सैनिकों के बीच संघर्ष में उन छह सैनिकों की मौत हो गयी.
शवों को गंडक नदी में किया गया विसर्जित
घटना के बाद ब्रिटिश सैनिकों के शवों को बैलगाड़ी पर लादकर अमनौर के पास गंडक नदी तक ले जाने और वहां जल समाधि देने का उल्लेख स्थानीय इतिहास के विवरणों में मिलता है. यह घटना मढ़ौरा में अंग्रेजी शासन के खिलाफ हुए उग्र प्रतिरोध का एक चर्चित अध्याय बन गयी.
बहुरिया रामस्वरूप देवी की भूमिका भी रही अहम
महता गाछी की सभा और उससे जुड़े आंदोलन में बहुरिया रामस्वरूप देवी का नाम प्रमुखता से सामने आता है. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सारण में महिलाओं की भागीदारी और स्थानीय नेतृत्व में उनकी भूमिका इस घटना को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है.
1942 की उस घटना की याद आज भी जिंदा
महता गाछी गोरा कांड मढ़ौरा और सारण के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद किया जाता है. यह घटना बताती है कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के छोटे शहरों और गांवों में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों का आक्रोश किस तरह सड़कों और सार्वजनिक स्थलों तक पहुंच गया था.
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