जब सीने पर गोली खाकर शहीद हुआ बेटा, तो फख्र से भर गया था पिता का सीना; पढ़ें गड़खा के लाल की अमर गाथा

गड़खा के लाल, शहीद इन्द्रदेव चौधरी की देशभक्ति की गाथा आज भी युवाओं को प्रेरित करती है. पटना साइंस कॉलेज के छात्र इन्द्रदेव ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन में प्राणों की आहुति दी. उनके पिता ने शहीद पुत्र को गर्व से नमन किया.

Chhapra Freedom Movement History: महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आह्वान पर देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले गड़खा के लाल शहीद इन्द्रदेव चौधरी की शहादत को आज भी लोग शिद्दत से याद करते हैं. उनकी अमर गाथा आज भी क्षेत्र के युवाओं में देशभक्ति का जज्बा भरती है और लोग उनके पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लेते हैं.

पटना साइंस कॉलेज के छात्र थे इन्द्रदेव

1 अक्टूबर 1922 को जन्मे गड़खा बाजार निवासी जगलाल चौधरी के पुत्र इन्द्रदेव चौधरी उस समय पटना साइंस कॉलेज के होनहार छात्र थे. देश में आजादी की लड़ाई चरम पर थी और 1942 की अगस्त क्रांति में इन्द्रदेव भी अपने साथियों के साथ अंग्रेजों से लोहा लेने मैदान में कूद पड़े. 11 अगस्त 1942 को जब सैकड़ों छात्र और नागरिक पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने पहुंचे, तो अंग्रेज सिपाहियों ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी. इस ऐतिहासिक सचिवालय गोलीकांड में जिले के दो वीर शहीद हुए थे, जबकि इन्द्रदेव चौधरी अपने साथियों के साथ डटे रहे और गंभीर रूप से घायल हो गए.

घायल अवस्था में भी नहीं रुका संघर्ष

पटना में घायल होने के बावजूद वे किसी तरह छुपते-छिपाते अपने पैतृक निवास गड़खा पहुंचे. सीने में आजादी की धधकती आग के कारण वे घायल अवस्था में भी शांत नहीं बैठे और अपने साथियों को एकजुट कर दोबारा आंदोलन में कूद पड़े.

गड़खा चौक पर खाई सीने पर गोली

22 अगस्त 1942 को जब अंग्रेज पुलिस गड़खा चौक पर इकट्ठा होने लगी, तो इन्द्रदेव चौधरी अपने साथियों के साथ निडर होकर उन पर पत्थर बरसाने लगे. इसी दौरान अंग्रेजों द्वारा चलाई गई गोली सीधे इन्द्रदेव के सीने में जा लगी और वे गड़खा चौक पर ही भारत माता की जय बोलते हुए शहीद हो गए. इस घटना में उनके कई अन्य साथी भी घायल हुए थे. अंग्रेज पुलिस उनके शव को छपरा टाउन थाना ले गई.

पिता ने कहा- 'धन्य हो पुत्र'

उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के कारण इन्द्रदेव के पिता जगलाल चौधरी को भी देखते ही गोली मारने का आदेश जारी था. जगलाल चौधरी ने छपरा एसडीओ के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. इसके बाद पुलिस कस्टडी में वे टाउन थाना पहुंचे और जब अपने शहीद पुत्र के पार्थिव शरीर को देखा, तो गर्व से बोले- "धन्य हो पुत्र, जो तुमने अपनी मां के कर्ज को उतार दिया."

उस दौर में पूरे इलाके में 'युग-युग जीओ लाल, तुने कर दिया कमाल' के गगनभेदी नारे गूंज उठे थे, जो आज भी इतिहास के पन्नों में अमर हैं.

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लेखक के बारे में

By राणा प्रताप सिंह

राणा प्रताप सिंह पिछले 16 वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हैं. प्रिंट के साथ-साथ डिजिटल में भी दस वर्ष का अनुभव है. जन सरोकार से जुड़ी खबरों में विशेष रूचि है.

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