Ramswarupa Devi: वर्ष 1942 अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पूरा देश आंदोलन की आग में तप रहा था. बिहार में भी स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था. पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के दौरान सात नौजवानों की शहादत ने पूरे बिहार को झकझोर दिया था. इसी दौर में सारण के अमनौर की एक विधवा महिला ने स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसी भूमिका निभायी कि उन्हें बिहार की ‘लक्ष्मीबाई’ के रूप में याद किया जाने लगा. उनका नाम था बहुरिया रामस्वरूपा देवी.
विधवा से वीरांगना तक का सफर
अमनौर स्टेट के स्वतंत्रता सेनानी हरिमाधव प्रसाद सिंह की पत्नी रामस्वरूपा देवी ने वर्ष 1937 में पति को खो दिया था. पति की मृत्यु के बाद उन्होंने खुद को घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि देश की आजादी को अपना लक्ष्य बना लिया. उन्होंने तिरंगा हाथ में लेकर गांव-गांव घूमकर लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया.
अंग्रेजी हुकूमत ने उनके आंदोलनकारी तेवर को देखते हुए उन्हें जेल भी भेजा, लेकिन इससे उनके हौसले में कोई कमी नहीं आयी. वह लगातार लोगों के बीच आजादी की अलख जगाती रहीं.
18 अगस्त 1942 को महथा गाछी में हुआ था संघर्ष
1942 के आंदोलन के दौरान मढ़ौरा की फैक्ट्रियों पर कब्जा करने और थाना पर तिरंगा फहराने की योजना बनायी गयी थी. इसी क्रम में 18 अगस्त को महथा गाछी में सभा आयोजित की गयी थी. सभा के दौरान अंग्रेजी फौज हथियारों के साथ वहां पहुंच गयी और गोलीबारी शुरू कर दी.
अंग्रेजों की गोलीबारी से सभा में भगदड़ मच गयी और लोग इधर-उधर भागने लगे. इसी दौरान बहुरिया रामस्वरूपा देवी ने लोगों का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें वापस लौटने का आह्वान किया. उनकी ललकार से आंदोलनकारी फिर एकजुट हुए और लाठी-डंडे तथा ईंट-पत्थर लेकर अंग्रेजी सैनिकों का मुकाबला करने लगे.
रामस्वरूपा देवी की ललकार ने बदला आंदोलन का रुख
कहा जाता है कि रामस्वरूपा देवी ने लोगों से डरकर भागने के बजाय संघर्ष करने का आह्वान किया था. उनकी आवाज ने आंदोलनकारियों में नया जोश भर दिया. इसके बाद ग्रामीणों ने अंग्रेजी फौज का जमकर प्रतिरोध किया. संघर्ष में कई अंग्रेज सैनिकों के मारे जाने की बात स्थानीय इतिहास में दर्ज है. इस दौरान वीर रामजीवन सिंह भी शहीद हुए.
बारिश की रात में हटाये गये शव
संघर्ष के बाद अंग्रेज सैनिकों के शवों को वहां से हटाने के लिए रात का इंतजार किया गया. उसी रात तेज बारिश हुई. स्थानीय लोगों ने शवों को बैलगाड़ी पर लादकर परशुरामपुर की नारायणी-गंडक नदी तक पहुंचाया और मिट्टी के घड़ों की मदद से नदी में डुबो दिया. इस तरह घटना से जुड़े कई साक्ष्य भी समय के साथ समाप्त हो गये.
आज भी याद की जाती है वीरांगना की बहादुरी
महथा गाछी की घटना ने रामस्वरूपा देवी को अमनौर ही नहीं, बल्कि सारण के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में विशिष्ट स्थान दिलाया. पति की मृत्यु के बाद तिरंगा हाथ में लेकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाली रामस्वरूपा देवी को आज भी ‘वीरांगना बहुरिया रामस्वरूपा देवी’ के नाम से याद किया जाता है. महथा गाछी की धरती आज भी उनके साहस और देशभक्ति की कहानी सुनाती है.
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