Samastipur News: समस्तीपुर जिले के मोरवा प्रखंड में बाल विकास परियोजना कार्यालय की एक बड़ी मनमानी और विभागीय निर्देशों की घोर अनदेखी का मामला प्रकाश में आया है. राज्य सरकार और समाज कल्याण विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद, मोरवा प्रखंड के सभी 219 आंगनबाड़ी केंद्रों पर खाद्यान्न (चावल) की डोर-स्टेप डिलीवरी सुनिश्चित नहीं कराई जा रही है. इसके विपरीत, विभागीय प्रावधानों को ठंडे बस्ते में डालकर जमीनी स्तर पर कार्यरत आंगनबाड़ी सेविकाओं को स्वयं अपने खर्चे पर एफसीआई (FCI) गोदाम से चावल का उठाव करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. प्रशासनिक तानाशाही के इस फरमान के कारण न सिर्फ सेविकाओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है, बल्कि पचभिण्डा स्थित एफसीआई गोदाम के ‘डेंजर जोन’ में होने के कारण उनकी सुरक्षा भी भगवान भरोसे है.
दुर्घटनाओं का साया, सहमी रहती हैं सेविकाएं
पचभिण्डा स्थित जिस एफसीआई गोदाम से अनाज का उठाव कराया जा रहा है, उसकी भौगोलिक स्थिति बेहद संवेदनशील और खतरनाक है. यह गोदाम मुख्य फोरलेन सड़क के ठीक बगल में अवस्थित है, जहाँ दिन-रात तेज रफ्तार वाहनों का आना-जाना लगा रहता है और अक्सर भीषण सड़क दुर्घटनाएं होती रहती हैं. इसके अलावा, इस सुनसान फोरलेन खिड़की के आसपास सामाजिक तत्वों और अपराधियों का भी बोलबाला रहता है.
ऐसी असुरक्षित और डरावनी परिस्थितियों के बीच दूर-दराज के गांवों से आने वाली महिला सेविकाएं खुद को बेहद असहज और असुरक्षित महसूस करती हैं. कई सेविकाओं ने दबी जुबान से बताया कि गोदाम पर आने-जाने के क्रम में पूर्व में कई छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं, लेकिन बाल विकास परियोजना के आला अधिकारी इस गंभीर खतरे को सुनने और समझने को कतई तैयार नहीं हैं.
PDS दुकानदारों को घर तक अनाज
हैरानी की बात यह है कि इसी मोरवा एफसीआई गोदाम से अनाज का उठाव करने वाले जन वितरण प्रणाली (PDS) के दुकानदारों के लिए तो सरकार द्वारा तय ‘डोर-स्टेप डिलीवरी’ (घर तक अनाज पहुंचाने) की पुख्ता व्यवस्था लागू है. लेकिन, समाज के सबसे संवेदनशील हिस्से यानी बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पूरक पोषाहार बांटने वाली महिला सेविकाओं को खुद के खर्चे पर जान जोखिम में डालकर चावल उठाने गोदाम पर पहुंचना पड़ रहा है.
क्षेत्र में यह गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है कि सरकार द्वारा खाद्यान्न के परिवहन (ट्रांसपोर्टेशन) के लिए जो मोटी राशि आवंटित की जाती है, उसे स्थानीय स्तर पर मिलीभगत कर डकार लिया जाता है. यही कारण है कि विगत कई वर्षों से सेविकाएं निजी गाड़ियां, ई-रिक्शा या ऑटो का भारी भाड़ा खुद वहन करके केंद्रों तक चावल ला रही हैं, जिससे उनकी जेब पर भारी अतिरिक्त भार पड़ रहा है.
बहुआयामी काम का दबाव
सेविकाओं का कहना है कि वे पहले से ही विभागीय और गैर-विभागीय कार्यों के अत्यधिक दबाव में जी रही हैं. धरातल पर उन्हें प्रतिदिन इन मुख्य दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता है:
- कुपोषण मुक्ति व पोषाहार: केंद्रों पर बच्चों को नियमित गर्म पका भोजन और पूरक पोषण आहार उपलब्ध कराना.
- स्वास्थ्य व डिजिटल ट्रैकिंग: बच्चों और गर्भवती माताओं का नियमित डिजिटल ट्रैकिंग ऐप पर पंजीकरण, पोषण स्तर की निगरानी और स्वास्थ्य सर्वे करना.
- टीकाकरण व गृह भ्रमण: स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय स्थापित कर टीकाकरण अभियानों को सफल बनाना और घर-घर जाकर संपर्क स्थापित करना.
- सरकारी योजनाएं: कन्या उत्थान और मातृत्व वंदना जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारना.
इन तमाम व्यस्तताओं के बीच, एफसीआई गोदाम तक जाकर खाद्यान्न की कतारों में खड़ा होना और संसाधनों की बर्बादी करना उनके नियमित शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों को पूरी तरह प्रभावित कर रहा है. प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि यह व्यवस्था सीधे तौर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता को दर्शाती है, जिसकी उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.
सीडीपीओ का गैर-जिम्मेदाराना तर्क
विभागीय प्रावधानों के अनुसार, आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन सुचारु रूप से करने और महिला कर्मियों को परिवहन संबंधी कठिनाइयों से बचाने के लिए चावल को सीधे केंद्र के दरवाजे तक पहुंचाना अनिवार्य है. जब इस पूरी अव्यवस्था, नियमों के उल्लंघन और सेविकाओं की सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवालों को लेकर मोरवा की बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) श्वेता कुमारी से सीधे बात की गई, तो उन्होंने नियमों का हवाला देने के बजाय एक बेहद रटा-रटाया और गैर-जिम्मेदाराना तर्क देते हुए कहा कि यह व्यवस्था पूर्व से ही इसी प्रकार लागू है और इसी तरह कार्य चल रहा है. सीडीपीओ का यह बयान साफ करता है कि स्थानीय स्तर पर सुधार की कोई इच्छाशक्ति नहीं है, जिससे क्षेत्र की सेविकाओं में भारी आक्रोश है.
समस्तीपुर के मोरवा से मनोज वर्मा की रिपोर्ट
