RPCAU Pusa: पूर्वी भारत में कृषि को आधुनिक और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा ने बड़ा कदम उठाया है. विश्वविद्यालय की दो दिवसीय विशेष शोध परिषद (रिसर्च काउंसिल) बैठक में लगभग 50 उच्च प्रभाव वाली कृषि शोध परियोजनाओं को वित्तीय स्वीकृति दी गई. इन परियोजनाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग, जीआईएस और जैव-प्रबलित फसल किस्मों के विकास पर विशेष जोर दिया गया है.
किसानों तक पहुंचेगी प्रयोगशाला की तकनीक
बैठक की अध्यक्षता करते हुए कुलपति डॉ. पी.एस. पाण्डेय ने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाना है. उन्होंने कहा कि स्वीकृत परियोजनाएं जलवायु अनुकूल खेती, प्राकृतिक कृषि और डिजिटल एग्रीकल्चर पर आधारित हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी.
उन्होंने बताया कि इन शोध परियोजनाओं के परिणाम अगले दो से तीन वर्षों में सामने आने की उम्मीद है, जो भारतीय कृषि को नई दिशा देंगे और विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मजबूत करेंगे.
एआई बताएगा कीटों का हमला, ड्रोन करेगा निगरानी
स्वीकृत परियोजनाओं के तहत एआई और मशीन लर्निंग की मदद से फसलों में कीटों के प्रकोप और पोषक तत्वों की कमी की पहले से पहचान की जाएगी. वहीं रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक से मिट्टी के स्वास्थ्य, सतही नमी और भूजल स्तर की निगरानी होगी.
शोध के आधार पर विकसित तकनीकों से सटीक सिंचाई (Precision Irrigation) और उर्वरकों के लक्षित उपयोग को बढ़ावा मिलेगा, जिससे लागत घटेगी और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर संरक्षण होगा.
विशेषज्ञों ने बताया अंतरराष्ट्रीय स्तर का शोध
रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी के डॉ. एस.के. चतुर्वेदी ने कहा कि प्रस्तुत शोध परियोजनाओं का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है. यदि देश के अन्य कृषि विश्वविद्यालय भी इसी दिशा में कार्य करें तो भारत अगले दस वर्षों में कृषि क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकता है.
आईसीएआर-केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. शैलेंद्र राजन ने कहा कि जैव-नवाचारों को डिजिटल तकनीक से जोड़ना कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. इससे किसानों की लागत घटेगी और उत्पादन क्षमता बढ़ेगी.
दो से तीन वर्षों में दिखेंगे परिणाम
निदेशक शोध डॉ. ए.के. सिंह ने बताया कि परिषद ने सटीक कृषि, उन्नत बीज प्रौद्योगिकी और जैव-प्रबलित फसल किस्मों से जुड़ी लगभग 50 परियोजनाओं का गहन मूल्यांकन कर उन्हें स्वीकृति दी है. अधिकांश परियोजनाओं के परिणाम अगले दो से तीन वर्षों में किसानों के खेतों तक पहुंचने लगेंगे.
बैठक में डीन पीजीसीए डॉ. मयंक राय, डॉ. रामदत्त, डॉ. पी.पी. श्रीवास्तव, डॉ. संतोष ठाकुर, डॉ. मुकेश कुमार, पीआरओ डॉ. कुमार राज्यवर्धन सहित विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और अधिकारी मौजूद रहे.
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