Bihar news:मजदूरों की हुंकार: समस्तीपुर में फूंका पीएम का पुतला, बोले- ''पूंजीपतियों की तिजोरी भरने के लिए बदले जा रहे श्रम कानून''

समस्तीपुर में सीटू और बिहार राज्य किसान सभा ने नए श्रम कानूनों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रधानमंत्री का पुतला फूंका. कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकार संशोधनों के जरिए मजदूरों के अधिकार छीनकर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचा रही है. प्रदर्शनकारियों ने इन कानूनों को तत्काल रद्द करने की मांग की है.

Bihar/Samastipur News:समस्तीपुर. देश में श्रम कानूनों में किए जा रहे बदलावों और किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन की आग अब तेज होने लगी है. सोमवार को समस्तीपुर समाहरणालय के समक्ष सीटू (CITU) और बिहार राज्य किसान सभा के कार्यकर्ताओं ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया. आक्रोशित कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और प्रधानमंत्री का पुतला दहन कर अपना रोष प्रकट किया.

बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप

सीटू जिला मंत्री मनोज कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में आयोजित इस सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला. बिहार राज्य किसान सभा के जिला मंत्री सत्यनारायण सिंह और महेश कुमार ने कहा कि सरकार लगातार जनविरोधी फैसले ले रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि श्रम कानूनों में संशोधन का एकमात्र उद्देश्य बड़े कॉर्पोरेट घरानों और पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाना है, जबकि देश का अन्नदाता और मजदूर आज हाशिए पर खड़ा है.प्रदर्शन में शामिल राघवेंद्र यादव, सुबोध कुमार और पूनम देवी ने कहा कि संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ कर ऐसी नीतियां लाई जा रही हैं जो आम जनता के अधिकारों का हनन करती हैं. कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि इन कानूनों को वापस नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप लेगा.

प्रमुख मांगें जिन पर अड़े कार्यकर्ता

आंदोलनकारियों ने जिला प्रशासन के माध्यम से अपनी मांगों को दोहराया, जिनमें प्रमुख हैं:चार नए श्रम कोड (Labour Codes) को तत्काल रद्द करना.मनरेगा कानून को उसके मूल स्वरूप और नाम के साथ यथावत रखना.संविधान में किए गए जनविरोधी संशोधनों को वापस लेना.न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देना.इस विरोध प्रदर्शन में दिनेश सहनी, सुरेंद्र कुमार, दिनेश राय, भूषण सिंह, छोटू भारद्वाज, मुकेश सहनी और रामदयाल भारती सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद थे.

विशेष विश्लेषण: आखिर क्यों हो रहा है नये श्रम कानूनों का विरोध?

केंद्र सरकार ने 44 पुराने श्रम कानूनों को मिलाकर 4 नए लेबर कोड (Labour Codes) तैयार किए हैं. सरकार का तर्क है कि इससे ”ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” बढ़ेगा, लेकिन मजदूर संगठनों का मानना है कि ये ”खामियों का पुलिंदा” हैं.

नये श्रम कानूनों की मुख्य खामियां:

”हायर एंड फायर” की छूट: नए नियमों के मुताबिक, जिस कंपनी में 300 से कम कर्मचारी हैं, वे बिना सरकार की पूर्व अनुमति के छंटनी या क्लोजर कर सकेंगे. पहले यह सीमा 100 कर्मचारियों की थी. इससे नौकरियों की सुरक्षा पूरी तरह खत्म होने का डर है.

काम के घंटों में बढ़ोतरी:

नए कोड में प्रतिदिन काम के घंटों को बढ़ाकर 12 घंटे तक करने का प्रावधान है. हालांकि सप्ताह में 48 घंटे की बात कही गई है, लेकिन संगठनों का मानना है कि इससे शोषण बढ़ेगा.

हड़ताल करना हुआ मुश्किल:

नए कानूनों में हड़ताल पर जाने से पहले की प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया गया है कि मजदूरों के लिए कानूनी रूप से विरोध दर्ज कराना लगभग असंभव हो जाएगा.

यूनियनों की शक्ति में कमी:

ट्रेड यूनियनों को मान्यता देने की शर्तों को सख्त बनाया गया है, जिससे मजदूरों की सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) की शक्ति कमजोर होगी.

फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट:

इसके जरिए कंपनियों को ”अनुबंध” पर कर्मचारी रखने की खुली छूट मिलेगी, जिससे स्थायी नौकरियों का चलन धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा.समस्तीपुर में हुआ यह प्रदर्शन इसी असंतोष की एक बानगी है, जहां खेतों से लेकर कारखानों तक के प्रतिनिधि अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं.

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Author: PREM KUMAR

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