गंगा ने निगल लिये एक दर्जन से अधिक गांव, अब सिर्फ नाम बाकी

गंगा नदी ने समस्तीपुर के एक दर्जन से अधिक गांवों को निगल लिया है, जिससे हजारों परिवार दशकों से विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं. इन परिवारों को आज तक पुनर्वास का इंतजार है. बाढ़ और कटाव का दंश इन्हें लगातार झेलना पड़ रहा है.

समस्तीपुर: मोहनपुर प्रखंड के एक दर्जन से अधिक गांवों के अब सिर्फ नाम रह गये हैं. कभी घनी आबादी वाले इन गांवों को गंगा नदी ऐसे लील गयी कि बित्ते भर जमीन भी नहीं बची. चारों ओर पानी और बालू ही नजर आता है. बाढ़ और कटाव की मार झेल रहे इन गांवों के हजारों परिवार दशकों बाद भी विस्थापन का दर्द झेलने को विवश हैं.

गंगा में समा गये कई गांव, आबादी को तलाशना पड़ा नया ठिकाना

धरनी पट्टी पश्चिमी पंचायत के बरुआ, जहींगरा, मकनपुर, सरसावा, धरनी पट्टी पूर्वी पंचायत के पचासा, हरिदासपुर, बघड़ा पंचायत के बरियारपुर, कुतुबपुर और डुमरी दक्षिणी पंचायत के शाह आलमपुर जैसे गांवों का नाम भी ऐसे प्रभावित इलाकों में शामिल है. इन गांवों की आबादी धीरे-धीरे उत्तरवर्ती क्षेत्रों की ओर बढ़ती गयी और वहां नये क्षेत्र आबाद होते गये.

पूर्णतः खेती-बाड़ी पर आश्रित रहे यहां के लोगों ने जीविका के लिए नये साधन तलाशे, लेकिन अपनी जमीन से उनका मोह बना रहा. गर्मी के मौसम में गंगा नदी कुछ जमीन छोड़कर सिमटती है, तब वहां बालू पर उगने वाली फसलों की खेती की जाती है. कड़ी मेहनत और हर मौसम के अनुकूल खुद को ढालने वाले किसानों को इससे इतनी ही आमदनी हो पाती है कि किसी तरह जीवन चल सके.

बरसात आते ही जमीन पर पानी का कब्जा

बरसात के मौसम में इन जमीनों पर पानी का कब्जा रहता है. इस बार की बाढ़ में भी गंगा नदी का इन जमीनों पर जबरदस्त कब्जा रहा. लोगों ने उत्तर की ओर जो घर बनाये थे, गंगा वहां तक पहुंच गयी. हालांकि घरों से पानी निकल रहा है, लेकिन जमीन पर कई महीनों तक जलजमाव बने रहने की आशंका है. इससे कृषि भूमि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

दशकों बाद भी पुनर्वास का इंतजार

बाढ़ और कटाव का दुख झेल रहे हजारों परिवारों को दशकों बाद भी विस्थापन का दर्द साल रहा है. इनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है. दर्जनों परिवारों को सिर्फ पुनर्वास का आश्वासन मिला है.

हर बार बाढ़ आने पर इन भूमिपुत्रों के सामने विस्थापन का दर्द फिर खड़ा हो जाता है. अपनी जमीन और खेती से जुड़े रहने के बावजूद लगातार बदलती परिस्थितियों ने इनके सामने जीवन-यापन की चुनौती खड़ी कर दी है.

लाचारी के बीच जिंदगी की जद्दोजहद

अंतहीन पीड़ा को सीने में छिपाये ये परिवार जिंदगी की जद्दोजहद झेलने को विवश हैं. वर्षों से पुनर्वास और स्थायी समाधान की उम्मीद लगाये इन लोगों की आंखें अब किसी उद्धारक की तलाश में पथरा गयी हैं. बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी इनके लिए संकट खत्म नहीं होता, क्योंकि लंबे समय तक जलजमाव और खेती पर पड़ने वाला असर आने वाले दिनों की चिंता बढ़ाता रहता है.

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By Krishan mohan pathak

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