पतरघट (सहरसा). कोसी क्षेत्र कभी अपनी समृद्ध जैव विविधता, पारंपरिक कृषि व्यवस्था और देसी फसलों के लिए जाना जाता था. खेतों में मोटे अनाजों की हरियाली, नदियों में देसी मछलियों की भरमार और आसमान में गौरैया, कौवे, चील तथा गिद्ध जैसे पक्षियों की मौजूदगी यहां की पहचान थी. लेकिन बदलते समय, बढ़ते बाजारवाद, रासायनिक खेती और हाइब्रिड बीजों के बढ़ते प्रचलन ने इस समृद्ध विरासत को गहरे संकट में डाल दिया है.
पतरघट प्रखंड सहित पूरे कोसी क्षेत्र में कभी खैरही, कौनी, जौ, बाजरा, तीसी, कुरथी, मडुआ, तुलबुली, देसी मकई और देसी अरहर जैसी पारंपरिक फसलों की व्यापक खेती होती थी. धान की देशरिया, रानी शुक्ला, पैरवा, पैख और चननचूर जैसी देसी किस्में भी किसानों की पहचान मानी जाती थीं. अब इनकी जगह हाइब्रिड धान, गेहूं और मक्का ने ले ली है.
पोषण और स्वाद दोनों की हो रही है क्षति
विशेषज्ञों के अनुसार पारंपरिक फसलों में प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे आवश्यक पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. आयुर्वेदिक दृष्टि से भी इनका विशेष महत्व माना जाता है.
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कभी खैरही का भुजा-भात, मडुआ की रोटी, देसी अरहर की दाल और कोसी नदी की पोठिया जैसी मछलियां इस क्षेत्र की पहचान थीं. आज यह स्वाद और परंपरा धीरे-धीरे लोगों की यादों तक सिमटती जा रही है.
जैव विविधता पर भी पड़ा गहरा असर
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक फसलों के लुप्त होने से केवल कृषि विविधता ही प्रभावित नहीं हुई है, बल्कि जैव विविधता पर भी गंभीर असर पड़ा है. पहले खेतों और आसपास के इलाकों में आसानी से दिखने वाली चींटियां, तितलियां, विभिन्न प्रकार के कीट-पतंगे, गौरैया, कौवे, चील और गिद्ध अब तेजी से कम हो रहे हैं. वहीं कोसी नदी और उसकी सहायक धाराओं में मिलने वाली कई देसी मछलियां भी दुर्लभ होती जा रही हैं.
पर्यावरणविद इसके लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग, प्राकृतिक आवासों के विनाश और एकल फसल प्रणाली को प्रमुख कारण मानते हैं.
मोटे अनाज जीवनशैली संबंधी बीमारियों से बचाव में सहायक
विशेषज्ञों का कहना है कि मोटे अनाज मधुमेह, एनीमिया, हृदय रोग और अन्य जीवनशैली संबंधी बीमारियों से बचाव में सहायक माने जाते हैं. इसके बावजूद अधिक उत्पादन और त्वरित लाभ की उम्मीद में किसान तेजी से हाइब्रिड बीजों की ओर आकर्षित हुए हैं, जिससे पोषण सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.
बहुफसलीय खेती से घटा आत्मनिर्भरता का दायरा
स्थानीय किसानों का कहना है कि पहले बहुफसलीय खेती से परिवार की अधिकांश खाद्य जरूरतें गांव में ही पूरी हो जाती थीं. अनाज, दाल, तिलहन, सब्जियां और मोटे अनाज एक ही खेत से मिल जाते थे. इससे खेती की लागत कम रहती थी और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती थी.
अब अधिकांश किसान एक या दो फसलों तक सीमित हो गए हैं, जिससे मौसम की मार पड़ने पर आर्थिक नुकसान का खतरा बढ़ गया है.
देसी फसलों के संरक्षण की जरूरत
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते जलवायु चक्र और अनिश्चित मौसम के दौर में मोटे अनाज तथा देसी फसलें भविष्य के लिए अधिक टिकाऊ विकल्प साबित हो सकती हैं. ये कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देती हैं और सूखा व बाढ़ जैसी परिस्थितियों का अपेक्षाकृत बेहतर सामना करती हैं.
जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते देसी फसलों और जैव विविधता के संरक्षण के लिए प्रभावी पहल नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल पुस्तकों और कहानियों में ही जान सकेंगी. कोसी क्षेत्र की पारंपरिक कृषि संस्कृति, पौष्टिक खाद्य व्यवस्था और प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए सरकार, कृषि वैज्ञानिकों, सामाजिक संगठनों और किसानों को मिलकर ठोस प्रयास करने होंगे.
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