रोजा से धैर्य और आत्मसंयम का होता है विकास : डॉ मो लुतफुल्लाह

रोजा ना केवल आत्मसंयम एवं धैर्य की परीक्षा है, बल्कि यह अल्लाह से निकटता प्राप्त मार्ग है.

सहरसा. रोजा ना केवल आत्मसंयम एवं धैर्य की परीक्षा है, बल्कि यह अल्लाह से निकटता प्राप्त मार्ग है. कुरआन में कहा गया है कि अल्लाह के निकट एकमात्र स्वीकार्य धर्म इस्लाम है. इतिहास गवाह है कि प्रारंभ से ही विभिन्न धर्मों में रोजा को महत्व दिया गया है. जदयू जिला प्रवक्ता डॉ मो लुतफुल्लाह ने कहा कि रोजा रखने से इंसान में धैर्य एवं संयम विकसित होता है. जब व्यक्ति भूख एवं प्यास सहन करता है, तो लोगों की पीड़ा का एहसास होता है, जो अभाव में जी रहे रहे हैं. इससे दयालुता एवं सहानुभूति की भावना उत्पन्न होती है. आधुनिक मेडिकल साइंस भी इस बात की पुष्टि करता है कि रोजा रखने से स्वास्थ्य बेहतर होता है. उपवास के दौरान शरीर को विषाक्त पदार्थों से मुक्त होने का अवसर मिलता है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है एवं मानसिक स्थिरता बढ़ती है. उन्होंने कहा कि इस्लाम में जकात एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यवस्था है, जो गरीबी को दूर करने व समाज में आर्थिक संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है. प्रत्येक सक्षम व्यक्ति अपनी आमदनी का ढाई प्रतिशत गरीबों को दान करता है. कुरआन में जहां-जहां नमाज का उल्लेख किया गया है. वहीं जकात एवं फितरा देने की भी बात कही गयी है. उन्होंने कहा कि रमजान उल मुबारक का आखिरी अशरफ चल रहा है. हम सभी मिलकर अल्लाह पाक से दुआ फरमाए सभी की मगफिरत फरमाए सेहतमंद बख्श दे. सभी की जिंदगी में रहमत, बरकत, खुशहाली, तरक्की हो अल्लाह पाक से सभी के लिए दुआ है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Dipankar shriwastaw

दीपांकर श्रीवास्तव प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक जागरण से की. अभी प्रभात खबर के सहरसा कार्यालय में काम कर रहे हैं. शिक्षा, अनुसंधान, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

और पढ़ें
Tags

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >