कहां जा रहा है समाज
सहरसा : ‘पुत्र कुपुत्र हो सकता है, माता कुमाता हो नहीं सकती’ यह कहावत अब धूमिल होती जा रही है. अक्सर नवजात बच्चों को कहीं छोड़ देने या फेंक देने की कहानी सामने आती रहती है. ऐसी घटना बताती है कि पुत्र के साथ अब माता भी कुमाता होने लगी है. शुक्रवार को समाहरणालय रोड में जिला स्कूल के पास ऐसा ही दृश्य दिखा.
एक नवजात को कुता नोंच कर खा रहा था. लोंगो की नजर पड़ी तो देखने वालों की वहां भीड़ जुट गयी. लोगों में कई तरह की चर्चा शुरू हो गयी. कोई इसे कुमाता की करतूत तो कोई संवेदनहीन होते समाज का कृत्य बता रहा था. हालांकि उसी भीड़ के बीच लोग यह भी कह रहे थे कि यदि नवजात मृत पैदा हुआ या जन्म के बाद किसी कारण से उसकी मौत हो गयी, तो उसे फेंकना नहीं चाहिए. मृत शरीर को दफना देना चाहिए.
जीने का दें अधिकार
हालांकि उस भीड़ में लोग यह भी कह रहे थे यह गलत मंशावालों की करतूत है. फिर भी उसे ऐसा नहीं करना चाहिए. जब नौ माह तक गर्भ में रख सकती है तो जन्म देने के बाद उसे जीवन भी देना चाहिए.
यदि किसी कारण से वह पालन-पोषण नहीं कर सकती है तो उसे जीने का अधिकार देना चाहिए. किसी दत्तक गृह को ही सौंप देना चाहिए. इधर दत्तक गृह की प्रबंधक श्वेता कुमारी ने बताया कि शून्य से छह वर्ष तक के बच्चों को सभी सुविधा के साथ रहने की व्यवस्था है. उन्होंने बताया कि यदि किसी कारणवश कोई अपना बच्चा को संस्थान को सुपुर्द करते हैं तो उनका नाम गोपनीय रखा जायेगा.
