सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ मूर्ति निर्माण कला से पूर्णिया की बेटी ने बनायी अपनी पहचान

हुनर जो अब पूजा के लिए बन चुका है एक पवित्र साधना

हुनर जो अब पूजा के लिए बन चुका है एक पवित्र साधना

पूर्णिया. बसंत पंचमी का उत्सव जैसे जैसे करीब आ रहा है माता सरस्वती की प्रतिमा को बनाने वाले मूर्तिकारों के हाथ भी उतनी ही तेज से गति से मूर्तियों को सम्पूर्णता प्रदान करने में लगे हैं. शहर के विभिन्न स्थानों में ये मूर्तिकार बड़ी संख्या में मूर्तियों के निर्माण में लगे हैं. लेकिन मुख्यालय के बिलकुल करीब पंचमुखी महावीर मंदिर के निकट का नजारा कुछ और ही है क्योंकि इस स्थान पर पूर्णिया की एक बेटी विरासत में मिली मूर्तिकला से अपनी परंपरा को सहेजने में लगी हुई है. पूजा कुमारी ऐसी ही एक महिला मूर्तिकार हैं जो इस कला के माध्यम से न केवल अपनी जीविका चला रही हैं, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा भी बनी हैं. पूजा पिछले 11 वर्षों से लगातार मिट्टी से अलग अलग भगवान की सुंदर प्रतिमाएं बनाने का काम कर रही हैं. विशेषकर सरस्वती पूजा और अन्य त्योहारों के दौरान उनके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की भारी मांग रहती है. पूजा इस बार भी सरस्वती पूजा के अवसर पर माता सरस्वती की प्रतिमा बना मिट्टी में जान डाल रही है. 24 वर्षीया पूजा विभिन्न देवी-देवताओ की मूर्तियां बनाने की कला में इतनी माहिर हो चुकी है कि विभिन्न पूजन के आयोजनों में उनके द्वारा तैयार प्रतिमा की डिमांड अधिक होने लगती है.

उसके लिए आसान नहीं था यह सफ़र

पूजा बताती हैं कि उनके द्वारा मूर्ति निर्माण का यह सफर आसान नहीं था. मूर्तिकला के क्षेत्र में आमतौर पर पुरुषों का दबदबा देखा जाता है, लेकिन पूजा ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से इस धारणा को बदला है. उन्होंने अपनी कला को ही अपना पेशा बनाया और आज वे बारीकी से मिट्टी को तराश कर उसमें जान फूंक देती हैं. हालांकि पूजा ने यह कला अपने पिता से सीखी है. पूजा के पिता रामू जाने माने मूर्तिकार है. पूजा अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं. पूजा का साथ इनके भाई व बहन भी देते आये हैं.

पिता के लिए मिटटी मथने से शुरू हुआ यह सफ़र

मूर्ति निर्माण कला में निपुण हो चुकी पूजा कहती हैं कि उसने इस कार्य के लिए विधिवत कहीं से प्रशिक्षण हासिल नहीं की बल्कि छह साल की उम्र से ही पिता को अक्सर अकेले मूर्तियां बनाते देखती थी. बाद के दिनों में वह पिता की मदद के बहाने वो मिट्टी मंथने लगी. फिर धीरे-धीरे वह इस कला में निपुण होती चली गई और आज अपने बल पर अलग-अलग पंडालों में मूर्तियां बना रही है. पूजा खुद मैट्रिक तक की पढ़ाई कर अपनी बहन व भाई को पढ़ाई क्षेत्र में आगे बढाने में लगी हुई है. पूजा का कहना है की मिट्टी से मूर्ति गढ़ना मेरे लिए केवल काम नहीं, बल्कि एक साधना है. मैंने पिछले 11 सालों मे हर साल कुछ नया सीखने की कोशिश की है.

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By SATYENDRA SINHA

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