वासंतिक नवरात्र: मंत्रोच्चार के साथ की गयी कलश की स्थापना, गूंजे जयकारे

गूंजे जयकारे

नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री स्वरुप की हुई पूजा-अर्चना

गुलाबबाग और रामकृष्ण मिशन में होती है प्रतिमा की स्थापना

पूर्णिया. वासंतिक नवरात्र के पहले दिन गुरुवार को माता के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री स्वरुप की पूजा अर्चना की गई. भक्तों ने माता की पूजा अर्चना कर दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा आदि का पाठ किया. घरों में माता के जयकारे की गूंज होती रही. भक्तों ने माता से सुख समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना की. शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में वासंतिक नवरात्र की धूम रही. श्रद्धालुओं ने इस दौरान नवरात्र का व्रत भी रखा है. हालांकि प्रतिमा की स्थापना कर शहर के रामकृष्ण मिशन और गुलाबबाग सुनौली चौक पर ही वासंतिक नवरात्र का पूजन अनुष्ठान किया जाता है पर शहर और आस पास के देवी मंदिरों में हमेशा की तरह इस बार भी पूजनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. सभी देवी मंदिरों में गुरुवार को श्रद्धापूर्वक कलश स्थापित किया गया और पूजा-अर्चना की गई. यही वजह है कि पूर्णिया सिटी स्थित मां पूरणदेवी मंदिर, काली मंदिर, माता स्थान, गोकुलसिंह ठाकुरबाड़ी मंदिर आदि समेत सभी स्थायी मंदिरों में भक्ति की बयार बह रही है. वासंतिक नवरात्र के पहले दिन गुरुवार को भक्तों ने माता के मां पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा अर्चना की और अभिष्ट की कामना की. भक्तों ने विधि विधान से स्थापित कलश में मां ब्रह्मचारिणी की श्रद्धापूर्वक पूजा कर माता से सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना की. इसके बाद दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा आदि का पाठ किया और माता की भव्य आरती उतारी.

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चैत्र नवरात्र को ले गुप्त काली मंदिर में सजा माता का दरबार

पूर्णिया. चैत्र नवरात्र में इस साल फिर कसबा के गुप्त काली मंदिर में देवी मां का दरबार सज गया है. कोशी और पूर्णिया समेत पूरे सीमांचल में यह अकेला मंदिर है जहां एक साल में चार नवरात्र की पूजा होती है. पूजनोत्सव के इस आयोजन में काफी दूर दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में आते हैं और मत्था टेकते हैं. यहां महिलाओं के पूजन और हवन की भी व्यवस्था की जा रही है. जिला मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर दूर स्थित कसबा के कुम्हार टोली में गुप्त काली मंदिर है जहां मां काली के साथ देवी दुर्गा के सभी नौ रुपों के साथ देवी त्रिपुर सुन्दरी की प्रतिमा भी प्रतिष्ठापित है. ऐसी मान्यता है कि यहां देवी का जागृत स्वरुप है और यही वजह है कि चारों नवरात्र में यहां देवी की पूजा अर्चना और दर्शन के लिए दूर दूर से भक्त पहुंचते हैं. एक खास बात यह है कि यहां नवमी की तिथि को पूजन अनुष्ठान के बाद व्यापक रूप से हवन किया जाता है जिसमें महिलाओं की सर्वाधिक भागीदारी हुआ करती है. गुप्त काली मंदिर के प्रधान पुजारी शंकर पंडित उर्फ भगत जी बताते हैं कि कलश की स्थापना के साथ अनुष्ठान भी शुरू हो गया है. उन्होंने बताया कि इस बीच लगातार मंत्रोच्चार के साथ देवी की पूजा होगी और नियमित पाठ भी किया जाएगा.

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