बढ़ते अपराध का सवाल : सालों भर चर्चा हुई चिंतित भी दिखे पर कभी नहीं बन सका चुनावी मुद्दा

प्रशांत चौधरी, पूर्णिया : पूर्णिया के लिए यह विडंबना रही है कि चुनाव दर चुनाव हुए पर अपराध और इससे पैदा होने वाला दहशत कभी मुद्दा नहीं बना. इस बार चुनाव के मौके पर पूर्णियावासियों को यही सवाल साल रहा है. यहां के लोगों को इस बात का मलाल है कि जब भी बढ़ते अपराध […]

प्रशांत चौधरी, पूर्णिया : पूर्णिया के लिए यह विडंबना रही है कि चुनाव दर चुनाव हुए पर अपराध और इससे पैदा होने वाला दहशत कभी मुद्दा नहीं बना. इस बार चुनाव के मौके पर पूर्णियावासियों को यही सवाल साल रहा है. यहां के लोगों को इस बात का मलाल है कि जब भी बढ़ते अपराध की चर्चा होती है नेता जी आश्वासन की चाटनी चटाते हुए कन्नी कटा कर निकल जाते हैं.

यह मुद्दा नहीं बनता कि आने वाले दिनों में पूर्णिया को अपराधमुक्त होगा. चुनाव के इस मौसम में बढ़ते अपराध को लेकर पूर्णियावासियों का मन व्यथित है और इसी व्यथा के बीच यह मुद्दा अंदर ही अंदर सुलग रहा है.
दरअसल, हालिया सालों में जिस तरह अपराधी बेलगाम हुए हैं और अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं उनसे लोगों में असुरक्षा की भावनाएं बढ़ी हैं. नब्बे के दशक के बाद बीच के सालों में लोग काफी सुकून महसूस कर रहे थे पर इधर एक बार फिर पुराने दिन याद आने लगे हैं.
अगर देखा जाये तो पिछले दो सालों में जिले में हत्या, लूट और दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ी हैं. चोर इस तरह सक्रिय हो गये हैं कि आंख बंद डब्बा गायब वाली कहावत चरितार्थ होने लगी है.
हालांकि गंभीर घटनाओं में पुलिस का अनुसंधान सटीक बैठता रहा है पर न तो चोरी की घटनाएं कम हो रही हैं और न ही अपराधियों का मनोबल टूट रहा है. यही लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया है क्योंकि इसी से अमन-चैन और सुरक्षा का सवाल जुड़ा हुआ है. लोगों का यह सवाल है कि बढ़ते अपराध के मामले में नेता जी की खामोशी क्यों बढ़ जाती है.
लोगों को इस बात पर आश्चर्य भी है कि अपराध की घटनाओं को लेकर न तो कभी धरना-प्रदर्शन होता है और न ही पटना और दिल्ली में आवाज बुलंद हो पाती है. इस सवाल को लेकर सभी नाराज दिख रहे हैं. उनकी नाराजगी किसी एक से नहीं बल्कि उन सबसे है जो नेता जी बन कर उनके बीच आते-जाते रहे हैं.
शायद यही वजह है कि इस बार लोकसभा चुनाव में बढ़ते अपराध का मुद्दा अंदर ही अंदर सुलग रहा है. हालांकि इस पर कोई बहुत बोलने को तैयार नहीं पर कुछ लोग इतना ही कहते हैं कि इसका जवाब वे चुनाव में देंगे.

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