पूर्णिया : ...यही हाल रहा तो मक्का की खेती छोड़ देंगे जिले के किसान

नहीं मिल रहा बाजार बेहतर खेती के बावजूद बेहाल हैं किसान जूट और सूर्यमुखी के तर्ज पर मक्का की खेती से विमुख होने लगे हैं किसान पूर्णिया : यही हाल रहा तो इस साल पूर्णिया के किसान मक्का की खेती छोड़ देंगे. बाजार और बिकवाली के अभाव में अब किसानों का मक्का खेती के प्रति […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
नहीं मिल रहा बाजार बेहतर खेती के बावजूद बेहाल हैं किसान
जूट और सूर्यमुखी के तर्ज पर मक्का की खेती से विमुख होने लगे हैं किसान
पूर्णिया : यही हाल रहा तो इस साल पूर्णिया के किसान मक्का की खेती छोड़ देंगे. बाजार और बिकवाली के अभाव में अब किसानों का मक्का खेती के प्रति मोह भंग भी होने लगा है. हालात एक बार फिर से कृषि के क्षेत्र में बड़े बदलाव के तरफ इशारा कर रहा है. बीते एक दशक में मक्का की खेती और उपज ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापारिक रिश्ता कायम किया, जिसकी डोर अब कमजोर पड़ने लगी है. जानकारों के मुताबिक यह हालात मल्टी नेशनल कंपनियों के एकाधिकार की वजह से हो रहा है.
सरकारी नियंत्रण और बाजार तथा किसानों के अनाज के भंडारण के लिए पंचायतों में ई किसान भवन नहीं होने से खुले बाजार में बड़ी कंपनियों की मनमानी है. ऐसा कहा जा रहा है कि यही हाल वर्षो पहले केला और जुट की खेती करने वाले किसानों के साथ हुआ था और खेती का ट्रेंड किसानो को बदलना पड़ा था. हालात लगभग वही दिख रहा है . बीते साल मक्का के स्टॉक में छोटे और मझोले कारोबारियों की पूंजी घाटे की भेंट चढ़ गयी. एक अरब के घाटे के बाद छोटे-मझोले कारोबार बाजार में गौण पड़ गए और कंपनियों का एकाधिकार मंडी में कायम हो गया.
जीएसटी भी बाजार को कर रहा है प्रभावित
मक्का के कारोबार से जुड़े कारोबारियों और मल्टी नेशनल कंपनियों के प्रतिनिधियों के मुताबिक मक्का का बाजार बीते वर्ष जीएसटी लागू होने के बाद लड़खड़ाया था. मक्का से बनने वाली नूडल और अन्य खाद्य पदार्थों की फैक्ट्रियां बंद और प्रोडक्ट के मैनुफेक्चरिंग में ब्रेक लगने के बाद देश भर में मक्का में मंदी आयी थी जिससे स्टॉकियो को घाटे का सामना करना पड़ा था. इसके वाद बड़ी और छोटी कंपनियों ने मक्का स्टॉक करना बंद कर दिया है. यही वजह है कि बाजार में बिकवाली की कमी है.
मक्का की खेती पर मंडरा रहा है खतरा
कोसी और सीमांचल का इलाका कृषि आधारित क्षेत्र है और यहां के आर्थिक विकास का आधार भी यही है. सीमांचल के किसान अपने दम पर उन्नत खेती और बेहतर पैदावार की बदौलत खेती को एक पहचान दी है. कृषि उपज के दम पर ही गुलाबबाग मंडी अंतरराष्ट्रीय मंडी में शुमार है.
लेकिन, मक्का की बिकवाली के जो हालात बने हुए हैं वह कृषि क्षेत्र में बदलाव और कृषि विकास के लिये बेहतर नहीं है . सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार की तमाम घोषणाओं के बावजूद किसानों को उनकी उपज का वास्तविक दाम नहीं मिल रहा है और यही कारण है कि किसान खेती का ट्रेंड बदलने में मन बनाने लगे हैं.
निर्यातक प्रदेशों की बेहतर उपज बनी बाधक
मक्का कारोबार से जुड़े कारोबारियों की मानें तो जिन प्रदेशों में मक्का का निर्यात होता था वहां इस वर्ष मक्का की जबर्दस्त उपज हुई है.
बताया जाता है कि इन प्रदेशों में मक्का की सरकारी खरीद के साथ साथ यहां मक्का आधारित फूड प्रोसेसिंग कंपनियां भी है. अलबत्ता डिमांड था और खरीदार भी.
यही वजह थी कि बिकवाली के कारण मक्का की खेती सूबे में रफ्तार पकड़ ली थी. लेकिन बीते 3-4 वर्षों से वहां मक्का की खेती होने लगी और इसबार उपज बेहतर होने से उन प्रदेश के खरीदारों ने खरीदारी से मुंह मोड़ लिया. कारोबारियों का मानना है कि मक्का आधारित फूड प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों और ई किसान भवन के साथ साथ बिहार में भी मक्का का सरकारी खरीद होना चाहिए ताकि किसान और खेती आबाद रहे.
बाजार पर नियंत्रण नहीं
किसानों को बाजारों पर सरकार और प्रशासन का सीधा नियंत्रण नहींं होने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. गुलाबबाग में मक्का बेचने आए किसान शंभु मेहता कहते हैं कि अभी कारोबारी मनमाना दाम लगा रहे हैं. बिचौलिए कम दर पर लेते हैं और अधिक दर पर कंपनियों को बेचते हैं. इसी पर नियंत्रण होना चाहिए था क्योंकि किसानों को जो मुनाफा मिलना चाहिए वह बिचौलिए डकार रहे हैं.
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