Javed Akhtar Exclusive: शहर के भारतीय नृत्य कला मंदिर में आयोजित किताब उत्सव में शामिल होने पहुंचे प्रख्यात गीतकार और शायर जावेद अख्तर ने समाज में गिरते भाषाई स्तर व अपनी जड़ों से कटती युवा पीढ़ी पर गहरी चिंता व्यक्त की है. प्रभात खबर से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि आज के दौर में भाषा को बैंक बैलेंस से तौला जाने लगा है. यदि कोई व्यक्ति शुद्ध हिंदी या उर्दू बोलता है, तो बड़े शहरों में उसे हीन भावना से देखा जाता है और मान लिया जाता है कि वह किसी छोटे घर का होगा. इसके उलट, अंग्रेजी के गलत उच्चारण को पाप समझा जाता है.
जावेद साहब ने अपनी नई पुस्तक सीपियां के माध्यम से कबीर, रहीम व तुलसी के दोहों की आज के दौर में प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि हिंदी और उर्दू एक ही मां खड़ी बोली की दो बेटियां हैं, जिनका व्याकरण समान है. उन्होंने युवाओं को नसीहत दी कि लिखने से पहले साहित्यकारों को पढ़ना और उन्हें आत्मसात करना बेहद जरूरी है. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश.
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Q. बिहार के ऐतिहासिक महत्व, यहां की मिट्टी और साहित्य पर आपके क्या विचार है
– बिहार.., हिंदुस्तान के इतिहास की एक मुकम्मल तस्वीर है. मगध और वैशाली जैसे महान राज्य यहीं रहे. पटना यानी पाटलिपुत्र का इतिहास हजारों साल पुराना है. यहां का म्यूजियम मौर्य काल की विरासत को सहेजे हुए है. यह भूमि ज्ञान और सत्ता का केंद्र रही है. जहां तक साहित्य की बात है, तो बिहार, यूपी व दिल्ली का यह पूरा बेल्ट हिंदी-उर्दू की साझा संस्कृति का केंद्र रहा है. इस मिट्टी ने बड़े साहित्यकार दिये हैं. साहित्य और भाषा यहां की रगों में रची-बसी है.
Q. हिंदी और उर्दू को अक्सर अलग-अलग चश्मे से देखा जाता है, एक साहित्यकार के नाते आप इन्हें कैसे देखते हैं?
– दुनिया में हिंदी और उर्दू जैसी अनोखी जुबानें कोई दूसरी नहीं हैं. इनका ग्रामर बिल्कुल एक ही है, बस लिपि अलग है. ये दोनों खड़ी बोली की बेटियां हैं. यदि हम सरल भाषा का प्रयोग करें, तो इनमें कोई अंतर नहीं रह जाता.
Q. आपकी नयी किताब ‘सीपियां’ दोहों पर आधारित है. क्या आज के आधुनिक दौर में दोहे अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं?
– बिल्कुल नहीं. यह सोचना कि दोहे सिर्फ गांव की पाठशालाओं के लिए हैं, बहुत बड़ी गलती है. कबीर, रहीम और तुलसी के दोहों में विजडम (समझ) भरी हुई है. इंसान और समाज की जो समझ इन दो लाइनों में है, वह आज भी उतनी ही सटीक है. मेरी किताब इन्हीं ‘सीपियों’ से मोती तलाशने की एक कोशिश है.
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Q. आज के फिल्मी गानों के स्तर में जो गिरावट आयी है, उसका मुख्य कारण आप किसे मानते हैं?
– यह गिरावट हवा में नहीं आयी, बल्कि समाज का प्रतिबिंब है. पिछले 40-50 सालों में हमने भाषा को वह सम्मान नहीं दिया जो मिलना चाहिए था. चूंकि भाषा को बैंक में जमा नहीं किया जा सकता या निवेश नहीं किया जा सकता, इसलिए व्यावसायिक दौर में इसकी वैल्यू कम हो गयी. शिक्षा में भी भाषा को हाशिए पर धकेल दिया गया, जिससे नयी पीढ़ी की शब्दावली बेहद कम हो गयी है.
Q. आपने कहा कि आप अवधी लिख लेते हैं लेकिन भोजपुरी नहीं, इसका क्या कारण है? साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं को आप क्या दर्जा देते हैं?
– मेरी नानी अवधी बोलती थीं, तो बचपन में कहानियां सुनकर वह जुबान मेरे भीतर बस गयी. भोजपुरी अलग है, इसलिए मैं उसे नहीं लिख पाऊंगा. रही बात दर्जे की, तो अवधी और भोजपुरी को सिर्फ डायलेक्ट यानि बोली कहना गलत है. ये समृद्ध भाषाएं हैं जिनमें महान क्लासिक्स लिखे गए हैं. इन्हें पूरा सम्मान मिलना चाहिए.
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Q. जो युवा लेखन के क्षेत्र में आना चाहते हैं, उनके लिए आपकी क्या सलाह है? एक बेहतर रचना के लिए क्या आवश्यक है?
– लिखने की जल्दी न करें, पहले खूब पढ़ें. साहित्य को हजम करें और उस्तादों के काम का अध्ययन करें, तब समझ आएगा कि भावना को शब्दों में कैसे पिरोते हैं. एक बेहतर रचना केवल शब्दों का मेल नहीं होती, बल्कि वह एक महसूस किया गया विचार होती है. जब आपके दिल में समाज या अपनी दुनिया को लेकर कोई गहरी भावना, गम या खुशी होगी, तभी आप अच्छा साहित्य सृजन कर पाएंगे.
Q. आप किस्मत को नहीं मानते, तो फिर एक इंसान की सफलता में आप किसे सबसे बड़ा कारक मानते हैं
– देखिए, जिसे लोग किस्मत कहते हैं, मैं उसे एक मेले की तरह देखता हूं जहां हर कोई अपनी-अपनी कोशिश कर रहा है. असल में सफलता संयोग और तैयारी का मिलन है. सफलता तब मिलती है जब आप सही वक्त पर सही जगह मौजूद हों, लेकिन उस मौके का फायदा उठाने के लिए आपकी तैयारी पूरी होनी चाहिए. अगर मौका आ जाए और आप तैयार न हों, तो वह मौका बेकार है. युवाओं के लिए मेरी यही सलाह है कि वे रातों-रात सफल होने की जल्दी न करें.
