Bihar News: बिहार में सरकारी डॉक्टर क्यों ठुकरा रहे हैं नौकरी? नियुक्ति के बाद भी खाली हैं कुर्सियां

Bihar News: सरकारी नौकरी का ऑफर, महीनों लंबी प्रक्रिया और फिर भी डॉक्टर ज्वाइन करने से कतरा रहे हैं. बिहार के सरकारी अस्पतालों में इलाज से पहले अब सिस्टम खुद मरीज बनता दिख रहा है.

Bihar News: बिहार का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों एक अजीब संकट से जूझ रहा है. यहां समस्या डॉक्टरों की भर्ती न होने की नहीं, बल्कि नियुक्ति मिलने के बाद भी डॉक्टरों के योगदान न देने की है.

एमबीबीएस से लेकर आयुष चिकित्सकों तक, सैकड़ों डॉक्टर महीनों की चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद सरकारी नौकरी ठुकरा रहे हैं. नतीजा यह है कि अस्पतालों में कुर्सियां खाली हैं और स्वास्थ्य सेवाएं भरोसे के सहारे चल रही हैं.

संविदा का डर और कम वेतन का संकट

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ संविदा आधारित नियुक्तियां हैं. सरकारी नौकरी का मुख्य आकर्षण जीवन भर की सुरक्षा और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ होते हैं, जो संविदा वाली नौकरियों में नदारद हैं.

डॉक्टरों के मन में यह डर हमेशा बना रहता है कि दो साल बाद उनका अनुबंध नवीनीकृत होगा या नहीं. इसके साथ ही, निजी अस्पतालों की तुलना में सरकारी संविदा का वेतन काफी कम है. वर्तमान में शहर से लेकर कस्बों तक निजी अस्पतालों की बाढ़ आ गई है, जहां इन डॉक्टरों को बेहतर वर्किंग कंडीशन और आकर्षक वेतन पैकेज आसानी से मिल जाता है. यही कारण है कि सरकारी अस्पतालों में काम करने के बजाय डॉक्टर निजी संस्थानों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

तारीख पर तारीख का खेल और खाली रहती सीटें

विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो आयुष चिकित्सकों की नियुक्ति प्रक्रिया जो अप्रैल 2020 में शुरू हुई थी, उसकी योगदान प्रक्रिया जुलाई 2024 तक चली. इसके बावजूद कई डॉक्टरों ने अभी तक ज्वाइन नहीं किया है और लगातार समय बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. विभाग ने मजबूरी में उन्हें 15 जनवरी तक का अंतिम मौका दिया है.

इसी तरह विशेषज्ञ चिकित्सा पदाधिकारियों के मामले में भी तकनीकी सेवा आयोग द्वारा चयन के बाद भी दर्जनों डॉक्टरों ने योगदान नहीं दिया. जब डॉक्टर समय सीमा समाप्त होने के बाद भी नहीं आते, तो वे सीटें अगली नियुक्ति प्रक्रिया तक के लिए खाली रह जाती हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर बुरा असर पड़ता है.

निजी अस्पतालों का ‘बढ़िया पैकेज’ बना बड़ी चुनौती

आज के दौर में हर छोटे-बड़े शहर में निजी मेडिकल सुविधाओं का विस्तार तेजी से हुआ है. ये अस्पताल न केवल बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करते हैं, बल्कि डॉक्टरों को उनकी विशेषज्ञता के अनुसार भारी वेतन भी देते हैं. एक डॉक्टर के लिए सरकारी संविदा की नौकरी में मिलने वाले तनाव और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के मुकाबले निजी प्रैक्टिस या कॉर्पोरेट अस्पतालों में काम करना कहीं अधिक फायदेमंद साबित हो रहा है.

जब तक सरकार संविदा व्यवस्था को स्थायी नियुक्ति में नहीं बदलती या वेतनमान में बड़ा सुधार नहीं करती, तब तक सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कुर्सियां इसी तरह खाली रहने की आशंका बनी रहेगी.

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लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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