Patna News : पटना सिटी के गुजरी बाजार इलाके में एक ऐसा परिवार है, जो पिछले 186 वर्षों से मजहबी एकता और सांझी संस्कृति की अनोखी मिसाल पेश कर रहा है. यहां कसेरा परिवार चार पीढ़ियों से चेहल्लूम के मौके पर सिपहर बैठाकर इबादत करता आ रहा है. खास बात यह है कि यह एक हिंदू परिवार है, जो अपनी दुकान में बने महावीर स्थान के पास सिपहर स्थापित करता है और पूरे श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना के साथ इबादत भी करता है. इस परंपरा ने इलाके में भाईचारे और सद्भाव का मजबूत संदेश दिया है.
एक साथ होती है पूजा और इबादत
कसेरा परिवार की यह परंपरा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द की जीवंत तस्वीर है. परिवार के सदस्य जहां एक ओर हनुमान जी, गणेश जी और लक्ष्मी जी की प्रतिमाओं की विधिवत पूजा करते हैं, वहीं उसी स्थान के पास सिपहर स्थापित कर चेहल्लूम की इबादत भी करते हैं. चार दिनों तक सिपहर रखा जाता है, जिसमें धूप-बत्ती दिखाई जाती है और नियमित पूजा-अर्चना भी होती है.
परिवार का मानना है कि हर धर्म और मजहब का सम्मान करना ही असली संस्कृति है. यही वजह है कि इस आयोजन में पड़ोस के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और पूरी आस्था के साथ शामिल होते हैं.
1840 से चली आ रही परंपरा
इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1840 में हुई थी. खाजेकलां थाना क्षेत्र के गुजरी बाजार के पास रहने वाले परदादा फूनी लाल कसेरा ने सबसे पहले सिपहर स्थापित करने की शुरुआत की थी. उनके निधन के बाद यह जिम्मेदारी उनके पुत्र काशी लाल कसेरा ने संभाली.
इसके बाद यह परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंची, जहां स्वर्गीय लाल बाबू कसेरा और राजेंद्र प्रसाद कसेरा ने इसे आगे बढ़ाया. अब चौथी पीढ़ी के रूप में सुधीर कुमार कसेरा और गिरजा कसेरा इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं. परिवार के सदस्य बताते हैं कि बुधवार को सिपहर का पहलाम चैलीटाड़ स्थित कर्बला में किया जाएगा.
सिपहर बनाने में भी रही पहचान
कसेरा परिवार की पहचान सिर्फ सिपहर बैठाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह परिवार सिपहर बनाने की कला में भी माहिर रहा है. चार पीढ़ियों से जुड़े इस परिवार ने वर्षों तक सिपहर निर्माण का काम किया है.
सुधीर कुमार कसेरा बताते हैं कि पहले उनके यहां बने सिपहर पटना सिटी और सब्जीबाग के कई इमामबाड़ों में स्थापित किए जाते थे. उनकी नक्काशी और कारीगरी इतनी खास होती थी कि लोग दूर-दूर से यहां सिपहर बनवाने आते थे.
बदलते समय में परंपरा पर असर
हालांकि समय के साथ इस परंपरा पर भी असर पड़ा है. सिपहर घुमाने वालों की संख्या कम हो गई है और महंगाई ने भी इस काम को प्रभावित किया है. अब सिपहर की जगह ताजिया बनाने और रखने का चलन बढ़ गया है.
फिर भी कसेरा परिवार अपनी इस विरासत को बचाए रखने की पूरी कोशिश कर रहा है. उनकी यह पहल आज के समय में एक बड़ा संदेश देती है कि धर्म और मजहब से ऊपर उठकर इंसानियत और भाईचारे को कैसे जिंदा रखा जा सकता है.
