पटना : बाल श्रमिकों की खोजबीन के लिए गठित सरकारी धावा दल कागजी शेर साबित हो रहा है. दल के तीस सदस्यों के वेतन पर सरकार प्रति माह कम से कम तीस लाख रुपये खर्च कर रही है. काम सिर्फ बाल श्रमिकों को मुक्त कराने का है. लेकिन, नतीजा सिफर है. धावा दल इस साल जनवरी से मई तक के पांच महीने में मात्र 143 बाल श्रमिक ही खोज पाये हैं. हालत यह कि जिलों में बाल श्रमिकों को खोज निकालने के लिए नियमित ड्राइव नहीं चल रहा.राज्य सरकार धावा दल पर वेतन के अतिरिक्त भी पैसे खर्च कर रही है.
श्रम मंत्री विजय कुमार सिन्हा के अनुसार धावा दल की नियमित मॉनीटरिंग होती है. कई जिलों के कॉमर्शियल इलाकों को बालश्रम से मुक्त कराया गया है. धावा दल से रिपोर्ट भी मांगी गयी है. उन्होंने कहा कि धावा दल के सदस्य काम नहीं करेंगे, तो उन पर भी कार्रवाई होगी. सरकार ने धावा दल की सफलता के लिए स्टेट प्लान में श्रम विभाग के अलावा शिक्षा और समाज कल्याण विभाग को भी अहम जिम्मेदारी दी है. वहीं, श्रम विभाग का कहना है कि दूसरे दलों का उसे सहयोग नहीं मिलता है.
दूसरी ओर आधिकारिक सूत्र कहते हैं कि राज्य में बालश्रम से बच्चों को मुक्त कराने के लिए स्टेट प्लान तैयार है, लेकिन इसका पालन नहीं किया जा रहा है. श्रम संसाधन विभाग का बालश्रम को खत्म करने के लिए चलाया जा रहा व्यापक अभियान कागजों पर सिमट कर रह गया है.
विभाग के द्वारा सभी जिलों में धावा दल गठित किया गया है, जिसके संयोजक हर जिले के जिला श्रम अधीक्षक होते हैं. इसके अलावे दल में चार व्यक्ति होते हैं, जिनको बालश्रम को रोकने की जिम्मेदारी दी गयी है. बावजूद इसके बाल मजदूर हर जिले में वैसे सभी भीड़-भाड़ वाले इलाके में दिख जाते हैं, जहां से यह सभी अधिकारी हर दिन गुजरते हैं.
श्रम मंत्री बाेले
2017 से 2019 के मई तक 1231 बच्चोंको बालश्रम से मुक्त कराया गया है. इसमें से 304 बच्चों को विशेष आवासीय प्रशिक्षण केंद्र में पढ़ाई के लिए भेजा गया है. रेस्क्यू के बाद सभी बच्चों को चाइल्ड लेबर ट्रैकिंग सिस्टम से जोड़ा गया है.
– विजय कुमार सिन्हा, मंत्री, श्रम संसाधन
नाम नहीं छापने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया कि किसी भी जिले में बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के लिए नियमित ड्राइव नहीं चल रहा है. जबकि, विभाग की ओर से विज्ञापन, सड़कों पर पोस्टर में खर्च किये जा रहे हैं.
रेस्क्यू बाल
मजदूरों की संख्या
2017 486
2018 602
2019 मई 143
