जाबिर हुसेन
बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति
बात भले ही पांच साल पहले की है, लेकिन राजनीति में दिलचस्पी रखनेवालों के ध्यान में आज भी ताज़ा है. 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम आने पर एक सज्जन ने भाजपा की भारी जीत का श्रेय ओबीसी के निचले तबके के अटूट समर्थन को दिया था. उन्होंने अपने प्रकाशित लेख में आंकड़ों के भरोसे ये दावा किया था कि भाजपा की अकल्पनीय जीत में सबसे बड़ी भूमिका ओबीसी के निचले पायदान पर ठहरी इन्हीं तबकों की रही है. प्रकारांतर से उन सज्जन का दावा यह भी था कि इन समूहों के संगठित वोट से ही केंद्र की भाजपा सरकार अस्तित्व में आयी है.
लेख में यह संकेत भी छिपा था कि अगड़ी जातियों के साथ उन्नत पिछड़ी जातियों को भी लाजि़म है कि वो समय रहते इन उपेक्षित वर्गों के राजनीतिक महत्व को समझें और उनके प्रति अपना दृष्टिकोण बदलें. एक प्रकार से देखें तो यह बात आसानी से समझ में आ जाएगी कि ये वर्ग जिस पार्टी या गठबंधन को चाहे उसे राज्य या केंद्र में सत्तारूढ़ बनाने की ताक़त रखता है.
इसका साफ़ अर्थ यह हुआ कि यदि सबल जातियों ने समय रहते इन उपेक्षित वर्गों के प्रति अपना रूझान नहीं बदला और उन्हें समुचित राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं दी, तो आगे के चुनावों में भी वो भाजपा या एनडीए को अपना भरपूर समर्थन देने में संकोच नहीं करेंगे. मुझे नहीं मालूम इन स्पष्ट राजनीतिक संकेतों को विभिन्न विपक्षी नेताओं ने किस हद तक अंगीकार किया.
2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम कहां तक 2014 के परिणामों के उक्त विश्लेषण और निष्कर्ष को बल प्रदान करते हैं, इसके मूल्यांकन का सही समय शायद अभी नहीं आया.
ऐसा करना किसी अपरिपक्व नतीजे पर पहुंचने के बराबर होगा, क्योंकि बिहार-यूपी जैसे बड़े राज्यों में अभी तक प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने प्रामाणिक रूप से अपने चुनावी नतीजों का ज़मीनी अध्ययन-विश्लेषण नहीं किया है. जो बातें उनके नेताओं की ओर से अब तक कही गई हैं, और जो समाचार-पत्रों या टीवी चैनलों के माध्यम से सामने आयी हैं, उन्हें तात्कालिक प्रतिक्रिया से अधिक कुछ नहीं माना जा सकता.
इस मामले में, यूपी के मुक़ाबले बिहार ने ज्यादा संयम दिखाया है. अंदरखाने में जो भी विमर्श चलता हो, बिहार में महागठबंधन की पार्टियां खुलेआम अपनी हार का दोष सहयोगी पार्टियों पर नहीं मढ़ रहे हैं. यूपी में सतही छानबीन के बाद ही बसपा ने अपना फ़ैसला सुना दिया, और आनेवाले उपचुनावों में अकेले चलने का मन बना लिया. इस प्रकार, कुछ ही माह पहले जो गठबंधन वजूद में आया था, उसकी नींव हिल गयी.
अब जो खबर आ रही है, उसके अनुसार तीनों पार्टियां (बसपा, सपा और रालोद) जल्द ही एनडीए के अलावा अपने सहयोगियों के खिलाफ भी मोरचाबंद होंगी. इस घोषणा के बावजूद कि सबने फिर से भाजपा/एनडीए को हराने का संकल्प दोहराया है. अपने-अपने समूहों के साथ चुनाव में उतरने के जो नतीजे आनेवाले हैं, उनको लेकर अभी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. कुछ समय बाद ही सब कुछ सामने होगा.
जिन सज्जन ने 2014 के परिणामों के पीछे उपेक्षित ओबीसी वर्ग की भूमिका का दावा किया था, वो 2019 के परिणामों को भी उसी नजरिए से देख सकते हैं. उनका निष्कर्ष सही भी हो सकता है. सब लोग स्वीकारते हैं कि 2014 के चुनाव में कुछ खास समूहों को छोड़ अधिकांश वर्गों ने मेादी-प्रभाव के आगे माथा टेक दिया था. 2019 के चुनाव परिणाम इस अवधारणा को विस्तार देते हैं. इतिहास ने अवश्य ही इन समूहों को पांच साल का समय दिया था, ताकि वो अपने बीच की राजनीतिक दरारों को पाट सकें.
लेकिन अहंकार की छोटी-बड़ी लकीरों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. यूपी हो या बिहार, गैर भाजपा पार्टियों ने पिछले तीन दशकों में अपनी जमातों में पूरी गंभीरता के साथ भाजपा की नीतियों के प्रति अपने कार्यकर्ताओं को सचेत और सावधान करने के गंभीर प्रयास नहीं किये. विपक्ष की ओर से सारी कसरतें चुनाव की घोषणा के बाद ही आरंभ हुईं, ऐसा साफ़-साफ़ दिखता है. लोकसभा चुनाव की हार-जीत का ठीकरा जिस किसी के सिर फोड़ा जाए, एक बात यक्ष प्रश्न बनकर सामने खड़ी है. पिछले तीस-पैंतीस साल की अपनी सत्तावधि के दौरान हम अपनी जमातों को केवल वोट लेने के लिए ही इस्तेमाल करते रहे हैं.
आरक्षण का विषय भी हमारी इसी आकांक्षा की पूर्ति करता रहा है. हमने जहां-जहां, और जब-जब भी, सत्ता में भागीदारी की, हमारी प्राथमिकता में अपनी जमातों, खासकर नई पीढ़ियों को लोकतंत्र और संविधान के मूल तत्वों और आदर्शो के प्रति निष्ठापूर्वक प्रशिक्षित करने का दायित्व नहीं निभाया. यही कारण है, कठिन चुनौतियों को सामने देख हमारे पांव लड़खड़ाने लगते हैं.
हम अपनी क़तारों को संकीर्ण विचारों और उसके आत्मघाती परिणामों के प्रति भी सावधान नहीं कर पाते. आखिर ऐसा क्यों होता है कि रातों-रात हमारी समर्थक जमातें उग्र और उन्मादी नारों के प्रवाह में बह जाती हैं. और हम अपनी वैचारिक घोषणाओं की सार्थकता खो देते हैं.
इसके बाद, हम अपने सहयोगियों को बुरा-भला कहकर संतोष करने के सिवा और कर भी क्या सकते हैं! हमारे सामने शायद लंबी तैयारी और सार्थक जमीनी लड़ाई के लिए अपने औज़ारों को पैना करने की दृष्टि और योजना का भी अभाव है. जनता हमारी संकल्पहीनता देख निराशा के द्वार पर खड़ी है.
