पटना : अन्य भाषाओं को भी सीखेंगे सरकारी स्कूलों के छात्र

जल्द होगा यह स्कूलों में लागू, अधिकतम भाषाओं की प्रारंभिक जानकारी बच्चों को दी जायेगी पटना : राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे जल्द ही हिंदी और अंग्रेजी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं से भी अवगत होंगे. इन्हें भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं का प्रारंभिक पाठ पढ़ाया जायेगा. इस […]

जल्द होगा यह स्कूलों में लागू, अधिकतम भाषाओं की प्रारंभिक जानकारी बच्चों को दी जायेगी
पटना : राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे जल्द ही हिंदी और अंग्रेजी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं से भी अवगत होंगे. इन्हें भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं का प्रारंभिक पाठ पढ़ाया जायेगा. इस अनुसूची में अब तक देश की 22 अलग-अलग भाषाओं को शामिल किया जा चुका है.
इसमें अधिकतम भाषाओं की प्रारंभिक जानकारी बच्चों को दी जायेगी. फिलहाल शिक्षा विभाग के स्तर पर इसे लेकर कार्य योजना तैयार की जा रही है. इसे अंतिम रूप देने के बाद सभी स्कूलों में समान रूप से इसे लागू कर दिया जायेगा. फिलहाल भाषाओं का ज्ञान देने की यह योजना छठी क्लास से लेकर ऊपरी क्लास तक के छात्रों के लिए है.
इसके अंतर्गत छात्रों को सामान्य वार्तालाप की कुछ लाइनें हिंदी, अंग्रेजी के अलावा तमिल, गुजराती, मैथिली, कोणकनी, मराठी, बंगाली, असमिया समेत अन्य भाषाओं में लिखित रूप में मिलेंगी. जिन्हें बच्चे आपस में पढ़कर वार्तालाप करेंगे और इसका बकायदा पाठ भी करवाया जायेगा. वार्तालाप की लाइनें सामान्य बातचीत में होगी. मसलन, नाम क्या है, कहां रहते हैं समेत ऐसी ही अन्य लाइनें रहेंगी.
सप्ताह के अलग-अलग दिन बच्चे अलग-अलग भाषाओं का पाठ करेंगे. बच्चे आपस में एक-दूसरे से प्रश्न उत्तर के रूप में या पाठ के तौर पर पढ़कर भाषाओं को समझेंगे.
इससे इन्हें यह आभास हो सकेगा कि एक भी वाक्य को अलग-अलग भाषा में बोलने से इनके अर्थ और भाव एक समान ही रहते हैं, सिर्फ इनके बोलने के अंदाज में अंतर आता है. विभिन्न भाषाओं में उपयोग होने वाली क्रियाओं के लिए शब्द अलग-अलग होते हैं. इस तरह से भाषा के क्षेत्र में बच्चों के ज्ञान का स्तर समृद्ध होगा.
यह है इसका मुख्य मकसद
इसका मुख्य मकसद बच्चों को यह समझाना है कि देश की सभी भाषाओं का मूल स्वरूप और अंतर ध्वनि एक समान ही होती है. सिर्फ उनके बोलने और उच्चारण का तरीका अलग-अलग होता है.
इससे बच्चों को सभी भाषाओं में एकरूपता दिखेगी और मन में भाषा को लेकर किसी तरह का मतभेद पैदा नहीं होगा. अलग-अलग भाषाओं को समझने और बोलने से सामाजिक समरसता आती है. राष्ट्र के सभी हिस्से एक समान और सहज ही लगते हैं. बच्चों के चहुमुखी विकास में सहायता मिलेगी.

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