आपात दौर के लिए नहीं है पानी स्टोरेज की क्षमता
पटना : पटना देश के उन शहरों में शुमार है, जहां की पानी आपूर्ति अभी भी बिना किसी ठोस इन्फ्रास्ट्रक्चर के की जा रही है. अगर एक दिन की बिजली संकट पैदा हो जाये, तो शहर को पीने का पानी नहीं मिलेगा. दरअसल बोरिंग शुरू होती है, तो पानी मिलता है. शहर की 20 लाख आबादी के लिए एक- दो दिन पानी स्टोर करने की क्षमता राजधानी के पास नहीं है. बात साफ है कि राजधानी यानी निगम क्षेत्र में 114 बोरिंग व जर्जर पाइप लाइन के माध्यम से घर-घर पीने का पानी पहुंचाया जा रहा है.
बोरिंग ठप होने और पाइप लाइन लिकेज होने से सालों भर किसी-न-किसी इलाके में पीने के पानी का संकट बना रहता है. हैरत की बात यह है कि पानी स्टोर करने के लिए बनायी गयी योजना निगम की लापरवाही में फंस गयी. 100 करोड़ की जलमीनारों के आधे-अधूरे इन्फ्रास्ट्रक्चर आज भी इसके गवाह हैं. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक जल संकट के स्थायी निदान को लेकर पटना जलापूर्ति योजना बनायी गयी.
ताकि, शहरवासियों को 24 घंटे व सातों दिन शुद्ध पीने का पानी मिले. नगर आवास विकास विभाग ने योजना पूरा करने की जिम्मेदारी बिहार अरबन इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट काॅरपोरेशन (बुडको) को दी. बुडको प्रशासन ने वर्ष 2012 में निजी एजेंसी के सहयोग से योजना पर काम शुरू किया.
100 करोड़ की लागत से 18 वार्डों में आधी-अधूरी जलमीनारों की पाइलिंग की गयी. पाइप लाइन बिछायी गयी. लेकिन, अगस्त 2014 तक निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप काम नहीं किया, तो विभागीय निर्देश पर एजेंसी को टर्मिनेट कर दिया गया. स्थिति यह है कि शहर जल संकट के आपात और सालाना मुहाने पर हमेशा खड़ा रहता है जिम्मेदार 100 करोड़ रुपये सड़कों पर फेंक कर पिछले चार वर्षों से भूल गये हैं.
विभागीय पेच में फंसी है योजना
वर्ष 2014 में एजेंसी टर्मिनेट होने के बाद दूसरी एजेंसी का चयन करना था. ताकि, जलापूर्ति योजना को पूरा किया जा सके. लेकिन, विभागीय निर्देश पर योजना को दो भागों में बांट दिया गया. 18 वार्डों में बुडको व 54 वार्डों में निगम को योजना पूरा करने की जिम्मेदारी दी गयी. बुडको प्रशासन ने एजेंसी चयन को लेकर टेंडर निकाला. लेकिन, टेंडर में एजेंसियां शामिल नहीं हुई. आलम यह है कि विभागीय पेच में अब तक योजना फाइलों में लटकी हुई है.
