II अजय कुमार II
अपनी जरूरतों के लिए नहीं निर्भर होना पड़ता घर के पुरुषों पर
मसौढ़ी : नगर के काश्मीरगंज, रहमतगंज और मलकाना मुहल्लों समेत ग्रामीण क्षेत्रों की सैकड़ों महिलाएं आज बीड़ी बनाकर अपने स्वावलंबन की कहानी खुद बयां कर रही हैं.
इससे होने वाली आय से वे खुद की जरूरत के लिए घर के पुरुष सदस्यों पर निर्भर नहीं होतीं. काश्मीरगंज, रहमतगंज समेत अन्य मोहल्ले की महिलाओं की पहचान पहले पति व पिता के नाम से होती थी और वे अंगूठा लगाना ही जानती थीं. आज वे अपना हस्ताक्षर करना जान गयी हैं. इन महिलाओं ने अपनी पहचान कुटीर व्यवसायी के रूप में बना ली है. गरीबी और अशिक्षा का दंश झेलने वाली इन महिलाओं आज अपनी पहचान खुद बना ली है.
इन्हें बीड़ी बनाने का हुनर तो काफी पहले से मालूम था, लेकिन वे परिवार-समाज के दबाव में इसे नहीं अपना पाती थीं. इधर, बीच के वर्षों में ‘सरकार की सोच आधी आबादी के विकसित हुए बिना विकास की बात बेमानी है’ के नारे के बाद इनके बीच जागरूकता आयी. आज कमोबेश काश्मीरगंज ,रहमतगंज एवं मलकाना के प्रत्येक घर में बीड़ी बनाने का कारोबार जोर-शोर से चल रहा है.
बीड़ी बना इससे उपार्जित राशि से महिलाएं खुद की जरूरत की तो पूर्ति कर ही रही हैं, अपने परिवार के उन सदस्यों के लिए भी सहारा बन गयी हैं, जो अकेले की कमाई की बोझ से दब गये थे. काश्मीरगंज मुहल्ले की शहीना खातून, साहेला खातून , रूबी परवीन, जूली परवीन, नाजनी खातून, जयबुन निशा, शहनाज परवीन, जिन्नत परवीन, सोनी और शहनाज समेत दर्जनों महिलाएं अपने घर के बरामदे या आंगन में झुंड बना कर एक साथ हाथ में थाली या सूप लेकर बीड़ी बनाने में व्यस्त रहती हैं.
गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाली इन महिलाओं के पति व पिता या घर के दूसरे सदस्य टेलरिंग, गैराज या राजमिस्त्री जैसे कार्य करते हैं. ठेकेदार इन्हें बीड़ी बनाने में लगने वाले सारे सामान दे जाते हैं और फिर जिस हिसाब से वे बीड़ी बनाती हैं, उस हिसाब से ठेकेदार उन्हें देकर पैसा बीड़ी ले जाते हैं.
एक घर में 400-500 की कमाई हाे जाती है
इन महिलाओं को ठेकेदार प्रति हजार बीड़ी के लिए 500 ग्राम तेंदू पत्ता, 180 ग्राम जर्दा और 60 मीटर धागे का बंडल दे देते हैं. एक महिला एक दिन में एक हजार तक बीड़ी बना लेती है. इसके एवज में ठेकेदार 80 से 100 रुपये देते हैं. इस प्रकार घर में अगर पांच महिलाएं बीड़ी बना रही होती हैं, तो चार-पांच सौ की कमाई हो जाती है.
