नवादा (कार्यालय) : जिला पर्षद के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव संपन्न हो गया. इसके साथ ही जिप के बोर्ड गठन की औपचारिकता पूरी कर ली गयी. घर की चूल्हा-चौका से सीधे राजनीति में प्रवेश करने के बाद जिला पर्षद अध्यक्ष बनना पुष्पा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है.
राजनीति की एबीसीडी नहीं जाननेवाली पुष्पा को जिला पर्षद चलाने की कमान सौंप दी गयी है. पुष्पा इस जिम्मेवारी को लोगों के सहयोग से पूरा करने का जजवा पाल रखी है. शपथ ग्रहण के बाद पहले ही दिन पत्रकारों से बात करते हुए पुष्पा ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार लाने की बात कही. लगभग 22 वर्षीय पुष्पा बीए पार्ट वन में पढ़ाई भी कर रही हैं. तीन भाई बहनों में बड़ी पुष्पा अपने भाई और छोटी बहन को भी शिक्षा के क्षेत्र में जाने की बात कहती है.
बचपन से ही प्रतिभाशाली पुष्पा को समाज के लिए कुछ करने की तमन्ना थी.अध्यक्ष की कुरसी पर बैठने के बाद उसे पूरा करने की बात कहती है. राजनीति में कभी आने को नहीं सोचनेवाली पुष्पा अपने पति के आग्रह पर चुनाव लड़ी और जनता के विश्वास पर खरी उतरी. पुष्पा अध्यक्ष बनने के बाद घर में परिवार का खाना बनाना और पति की सेवा करना भी नहीं भूलती है.पद पर रहते हुए पढ़ाई भी जारी रखना चाहती है.
बुधवार को जैसे ही विकास भवन के सभागार में तमाम औपचारिकताएं पूरी हुई, सबने अपनी पीठ थपथपानी शुरू कर दी. किसी को इस बात का गुमान रहा ही नहीं कि यह जो जनता है, सब जानती है. हालांकि, राजनीतिक उठा-पटक में जो कुछ हुआ वह तथाकथित किंगमेकरों को अपनी गिरेबां में झांकने को बाध्य करता है. जिप आवास का गलियारा गुरुवार से गुलजार क्या हुआ, सब की कलई खुलनी शुरू हो गयी. लंबे समय तक जिप की राजनीति के सरपरस्त माने जाने वाले राजबल्लभ प्रसाद का कुनबा उनकी अनुपस्थिति में एक कदम आगे बढ़ाने का प्रयास करता तो दो कदम पीछे खिसने पड़ जाते.
वैसे ही दुष्कर्म के मामले में बिहारशरीफ जेल की सलाखों में कैद होने से इनका जिले की राजनीति पर पकड़ ढीली हुई है. जिप की राजनीति को संभाल रहे इनके भतीजा व पूर्व विधायक स्व कृष्णा प्रसाद के बेटे अगुआई तो कर रहे थे पर,अनुभव की कमी ने बताया कि जातीय पापड़ बेलने इतने आसान नहीं है. खासकर, तब जब टक्कर पुरखों के प्रतिद्वंद्वी से हो रही हो. इस पर आत्मविश्लेषण करना होगा कि आखिर समुचित संख्या बल के साथ अंदर गये तो गेम पलट कैसे गया. बताता है राजद खेमा ने अपना ही जनाधार खोया है. अध्यक्ष पद की जीत राजनीति का एक हिस्सा भर था. पर सारा खेल तो उपाध्यक्ष की कुरसी पाने को हो रही थी. दूसरे खेमे से स्वामी बाबा कमान संभाले थे.
करामात देखिये चलते-चलते रास्ते में ही मित्र मिल गये. विकास भवन की सीढियों पर कदम रखा तो मित्रता और भी प्रगाढ हो गयी. मजारा सब के सामने है. बतौर पार्षद स्वामी बाबा कहते हैं प्रभू कि माया है.राजनीति कहती है-दूसरों के लिये जीओ.पर हकीकत है कि यह सब रात के अंधेरे में तय हो चुका था. इस निर्णय ने राजद के साथ-साथ एनडीए गुट को भी झटका दे गया. कहते हैं इस गुट को लगने लगा था स्वजातीय नेताओं के हम एकलौते सिरमौर हैं.
नतीजा एक विकल्प सामने लाया गया.यह उपाध्यक्ष के आवास पर डेरा डाले दो ध्रुवों के बीच न सिर्फ अपनी उपस्थिति का अहसास दिलायेगा,बल्कि सशक्त विपक्ष की भूमिका भी निभायेगा.राजनीति इतराने का नहीं है. सबको साथ ले चलने का है.पर एक नजर जंगलों के बिहङवान पर भी डालें.इसे बिडंबना ही कहें पर विरोधियों को मूंह मांगा वरदान मिल गया.पहली बार जीत कर आयी पार्षद हर किसी के गले का पुष्प बन गयी.
विपक्षियों को लगा यह ऐसा फूल है जिसके कांटे हमेशा प्रतिद्वंदी को चुभते रहेंगे.इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता है.पंचायत राज के चुनाव की डुगडुगी बजी तो सारे बङे नेताओं ने उवाचा- गांव स्तर की बात है,हमारा कोई लेना देना नहीं.पर,बात जैसे ही अपने अस्तित्व की आयी तो सब एक दूसरे के खिलाफ तरकश संभाले खङे दिखने लगे.जब सब कुछ बीत गया तो इतना तो सोच लो किसने क्या पाया, क्या लुटाया.
