छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता व लोकपक्ष है. भक्ति और आध्यात्मक से परिपूर्ण इस पर्व के लिए विशाल पंडाल या भव्य मंदिरों की आवश्यकता नहीं है. न ही बिजली की चकाचौंध, पटाखों के धमाके और लाउडस्पीकर के शोर से दूर बांस से निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतन, गन्ने का रस, गुड़, चावल, गेहूं से निर्मित प्रसाद ही छठ पूजा में होती है.
शास्त्रों से अलग यह जनमानस द्वारा अपने रीति-रिवाजों से गढ़ी गयी उपासना की यह एक पद्धति है. इसमें न तो विशेष धन की जरूरत होती है, न पुराहित की और ना ही धर्मगुरू की. आस-पड़ोस की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्ते का प्रबंधन, तालाब, नदी किनारे अर्घ्यदान की व्यवस्था में समाज की भागीदारी होती है.
