मुजफ्फरपुर से विनय कुमार की रिपोर्ट
Muzaffarpur Model Hospital News:”सर, हम चीर-फाड़ और खून नहीं देखे हैं, इमरजेंसी ड्यूटी हम नहीं करेंगे. आप इसकी दूसरी व्यवस्था कीजिए. अगर ज्यादा दबाव पड़ेगा तो हम छह महीने के लिए मेडिकल लीव पर चले जाएंगे.” यह कोई आम शिकायत नहीं, बल्कि मुजफ्फरपुर के मॉडल अस्पताल के अधीक्षक चैंबर में गुरुवार की दोपहर हाई वोल्टेज ड्रामे के दौरान गूंजे एक महिला डॉक्टर के शब्द हैं. अस्पताल के कड़े नियमों और अनिवार्य रोटेशन का हवाला दिए जाने पर महिला डॉक्टर के पति ने तो सीधे सत्ता की हनक दिखा दी और अधीक्षक पर धौंस जमाते हुए
“चाचा विधायक हैं मेरे, आप कहिए तो बात करवाएं.”
पूरा वाक्या तब शुरू हुआ जब एक महिला शिशु रोग विशेषज्ञ (Pediatrician), दूसरे जिले में पदस्थापित अपने डॉक्टर पति के साथ मॉडल अस्पताल के अधीक्षक डॉ. ज्ञानेंदु शेखर के चैंबर में पहुंचीं. उन्होंने साफ शब्दों में इमरजेंसी ड्यूटी करने से मना कर दिया. महिला डॉक्टर का यह अनोखा तर्क सुनकर खुद अधीक्षक भी सोच में पड़ गए.अधीक्षक अभी इस बहाने का जवाब देने ही वाले थे कि डॉक्टर पति ने पैरवी और रसूख का रौब झाड़ना शुरू कर दिया. जब अधीक्षक ने सरकारी नियमों की बात की, तो पति ने सीधे विधायक चाचा का नाम ले लिया. इस पर अधीक्षक ने माहौल को संभालते हुए कहा कि “इतना मत जाइए, हो जाएगा.”
सीनियर डॉक्टर की एंट्री और ग्रुप से नाम हटाने की पैरवी
इसी बहस के बीच अस्पताल के वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ (Orthopedist) डॉ. पीएन वर्मा भी अधीक्षक के चैंबर में दाखिल हुए. उन्होंने आते ही पैरवी का मोर्चा संभाला और अधीक्षक से कहा कि “इस बच्ची को छोड़ दीजिए.” अधीक्षक ने जब कहा कि “ठीक है, छोड़ देंगे,” तो डॉ. वर्मा ने बात काटते हुए कड़े लहजे में कहा— “अरे छोड़ नहीं देंगे, ड्यूटी से नाम हटा दीजिए और डॉक्टरों के व्हाट्सएप ग्रुप में इसका नाम जोड़ दीजिए. इसकी जगह कोई दूसरा इमरजेंसी ड्यूटी संभाल लेगा.”
चिकित्सा जैसे सेवा भाव वाले पेशे में आकर इमरजेंसी ड्यूटी से बचने के लिए ‘खून और चीर-फाड़’ से डरने का यह बहाना पूरे मॉडल अस्पताल में चर्चा का विषय बना हुआ है.
मॉडल अस्पताल के अधीक्षक डॉ. ज्ञानेंदु शेखर
इस पूरे प्रकरण पर गहरा दुख और नाराजगी व्यक्त करते हुए मॉडल अस्पताल के अधीक्षक डॉ. ज्ञानेंदु शेखर ने अपने पुराने दिनों को याद किया. उन्होंने कहा कि तीन दशक पहले जब उन्होंने नौकरी शुरू की थी, तब अस्पतालों में न तो एसी (AC) था और न ही डॉक्टरों के लिए कोई वेटिंग रूम होता था. पूरी-पूरी रात मच्छर काटते रहते थे, लेकिन डॉक्टरों ने कभी अपनी ड्यूटी से मुंह नहीं मोड़ा. अधीक्षक ने कहा कि उस दौर में संसाधन नहीं थे, गर्मी के दिनों में हम लोग इमरजेंसी के बाहर चौकी पर बैठकर रात काटते थे, लेकिन मरीजों की सेवा पहले थी. आज के दौर में डॉक्टरों के पास तमाम सुख-सुविधाएं हैं, फिर भी ड्यूटी से बचने के लिए ऐसे अजीबोगरीब बहाने बनाना बेहद निराशाजनक है.
