जब मुजफ्फरपुर में हुए बम हमले ने उड़ा दी थी अंग्रेजों की नींद, इतिहास में अमर हुआ शहर

Muzaffarpur History: 30 अप्रैल 1908 की रात खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने ब्रिटिश जज किंग्सफोर्ड को निशाना बनाकर मुजफ्फरपुर में बम हमला किया. यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का ऐतिहासिक अध्याय बन गई. जानिए पूरी कहानी...

Muzaffarpur History: 30 अप्रैल 1908.. रात के करीब साढ़े आठ बजे.. मुजफ्फरपुर की सड़कें सामान्य थीं. यूरोपियन क्लब के बाहर रोज की तरह आवाजाही थी. किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में एक ऐसा धमाका होने वाला है, जिसकी गूंज पूरे ब्रिटिश साम्राज्य तक पहुंचेगी. बग्घी पर हुए बम हमले ने न सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी, बल्कि मुजफ्फरपुर को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया. बताया जाता है कि विस्फोट इतना तेज था कि उसकी आवाज करीब तीन मील दूर तक सुनाई दी.

जज किंग्सफोर्ड बना था क्रांतिकारियों का निशाना

किंग्सफोर्ड को सबक सिखाने निकले थे के दो वीर ( ai generated image)

उस दौर में ब्रिटिश जज डगलस किंग्सफोर्ड का नाम भारतीय क्रांतिकारियों के बीच दहशत और आक्रोश का कारण था. बंगाल में उसने कई युवा क्रांतिकारियों को कठोर सजाएं सुनाई थीं. विरोध बढ़ने पर अंग्रेज सरकार ने उसका तबादला मुजफ्फरपुर कर दिया, लेकिन क्रांतिकारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा. उन्होंने तय किया कि किंग्सफोर्ड को उसके अत्याचारों की सजा दी जाएगी.

18 साल का युवक जिसने अंग्रेजों को ललकारा

क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी मुज़फ़्फ़रपुर के यूरोपीय क्लब के बाहर रणनीति बनाते हुए (ai generated image)

क्रांतिकारी संगठन ने इस मिशन की जिम्मेदारी महज 18 वर्षीय खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी को सौंपी. दोनों गुप्त रूप से कई दिनों तक मुजफ्फरपुर में रहे और यूरोपियन क्लब के आसपास किंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखते रहे. सही मौके का इंतजार करते हुए उन्होंने कई दिनों तक उसकी दिनचर्या का अध्ययन किया.

एक भूल, जिसने इतिहास बदल दिया

जब एक दुखद भूल ने अंग्रेजी हुकूमत को अंदर तक कंपा दिया (ai generated image)

30 अप्रैल 1908 की रात यूरोपियन क्लब से निकली एक बग्घी को दोनों क्रांतिकारियों ने किंग्सफोर्ड की गाड़ी समझ लिया. जैसे ही बग्घी क्लब से कुछ दूरी पर पहुंची, उस पर बम फेंक दिया गया. विस्फोट इतना भीषण था कि पूरा इलाका दहल उठा. लेकिन यह एक दुखद भूल साबित हुई. जिस बग्घी को किंग्सफोर्ड की समझा गया था, उसमें वकील Pingle Kennedy की पत्नी और बेटी सवार थीं, जिनकी इस विस्फोट में मौत हो गई. किंग्सफोर्ड बच निकला, लेकिन अंग्रेजी प्रशासन पूरी तरह हिल गया.

पूरी रात चला तलाशी अभियान

पहली बार अंग्रेजों को अपने किलों के भीतर खतरा महसूस हुआ. (ai generated image)

धमाके के बाद मुजफ्फरपुर छावनी में बदल गया. रेलवे स्टेशन, धर्मशालाएं, सराय और शहर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर पुलिस और सैनिक तैनात कर दिए गए. पूरी रात तलाशी अभियान चलता रहा. पहली बार अंग्रेजों को एहसास हुआ कि भारतीय क्रांतिकारी अब उनके सबसे सुरक्षित अधिकारियों तक भी पहुंचने लगे हैं.

एक ने खुद को गोली मारी, दूसरा हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ा

फाँसी के तख्ते पर खड़ा एक युवक, और झुकता हुआ साम्राज्य (ai generated image)

घटना के बाद खुदीराम बोस एवं प्रफुल्लचंद चाकी दोनों पुलिस से बचते हुए रेलवे लाइन पकड़कर चलने लगे. रातभर चलने के बाद सुबह दोनों पूसा रोड स्टेशन पहुंचे. वहीं प्रफुल्लचंद चाकी पुलिस से घिर गए. गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने समस्तीपुर के पूसा रोड स्टेशन के पास खुद को गोली मार ली. वहीं खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया. मात्र 18 वर्ष की उम्र में 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी दे दी गई. फांसी के फंदे पर भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी, जिसने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अमर शहीद बना दिया.

छोटे शहर से उठी चिंगारी, पूरे देश को जगा दिया

खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी का बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि वह चिंगारी था जिसने पूरे देश में आजादी की लौ प्रज्वलित कर दी. (ai generated image)

महज 18 वर्ष की उम्र में खुदीराम बोस ने जिस साहस, त्याग और देशभक्ति का परिचय दिया, उसने पूरे देश के युवाओं को आजादी की लड़ाई में उतरने की प्रेरणा दी. वहीं प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी स्वीकार करने के बजाय अपने प्राण न्योछावर कर दिए. एक ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया, तो दूसरे ने मातृभूमि के सम्मान के लिए खुद को गोली मार ली. दोनों क्रांतिकारियों का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रेरणादायक गाथाओं में शामिल हो गया.

आजादी की लड़ाई में मिसाल बना मुजफ्फरपुर

जहाँ इतिहास ने क्रांति का नया अध्याय लिखा ( ai generated image)

किंग्सफोर्ड भले ही बच गया, लेकिन मुजफ्फरपुर बमकांड ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा और नई ऊर्जा दी. खुदीराम बोस युवाओं के लिए साहस, देशभक्ति और बलिदान के प्रतीक बन गए. आज भी 30 अप्रैल 1908 की वह रात मुजफ्फरपुर के इतिहास का सबसे गौरवशाली और चर्चित अध्याय मानी जाती है. मुजफ्फरपुर केवल एक शहर नहीं, बल्कि आजादी की उस क्रांतिकारी चेतना का प्रतीक बनकर सामने आता है, जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव तक हिला दी थी.

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Published by: Purushottam Kumar

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